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फाइलेरिया क्या है? – What is Filariasis in Hindi

फाइलेरिया क्या है?

दोस्तो, स्वागत है आपका हमारे ब्लॉग पर। दोस्तो, जरा गौर कीजिये मच्छर के आकार की और हाथी के पैर के आकार की। ज़मीन आसमान का अंतर। हमारा आज का टॉपिक ना तो मच्छर है और ना हाथी। मच्छर के काटने से होने वाला मलेरिया या डेंगू भी नहीं है अपितु एक ऐसा रोग है जो मच्छर के काटने से ही होता। इस रोग में मच्छर की शक्ति का प्रदर्शन हो जाता है कि किस प्रकार मच्छर काटकर आदमी के पैर को हाथी के पैर के समान मोटा कर देता है और जिसके लक्षण भी 7-8 वर्ष बाद पता चलते हैं। जी हां दोस्तो, यह रोग भारत में हाथीपांव के नाम से जाना जाता है। इसे मेडिकल भाषा में फाइलेरिया (Filariasis) कहा जाता है। इस रोग को फीलपांव और श्लीपद के नाम से भी जाना जाता है। भारत में इसके मरीजों की संख्या विश्व में सबसे अधिक है। भारत सरकार ने इसके उन्मूलन के लिये फाइलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम चला रखा है। आखिर इस रोग से घरेलू उपचार के जरिये कैसे छुटकारा पाया जाये? दोस्तो, यही है हमारा आज का टॉपिक “फाइलेरिया के घरेलू उपाय”

देसी हैल्थ क्लब इस आर्टिकल के माध्यम से आज आपको फाइलेरिया के बारे में विस्तार से जानकारी देगा और यह भी बतायेगा कि इससे राहत पाने के क्या घरेलू उपाय हैं। तो, सबसे पहले जानते हैं कि फाइलेरिया क्या है, फाइलेरिया के प्रकार और फाइलेरिया के चरण।  इसके बाद फिर बाकी बिन्दुओं पर जानकारी देंगे।  

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फाइलेरिया क्या है?
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फाइलेरिया क्या है? – What is Filariasis?

साधारण भाषा में कहा जाये तो फाइलेरिया, फ्युलेक्स तथा मैनसोनाइडिस प्रजाति के मच्छरों के काटने पर फाइलेरिओडी” (Filarioidea) नामक निमेटोड कीड़ों परजीवी तथा कुछ अन्य रक्त पीने वाले कीड़ों, के रक्त में प्रवेश करने से होने वाला रोग है। यह रोग हाथीपांव के नाम से अधिक जाना जाता है क्योंकि इसमें पैर हाथी के पैर के समान मोटा हो जाता है। इस रोग का संक्रमण सामान्यतः से बचपन में होता है लेकिन इसके लक्षण 7 से 8 वर्ष के पश्चात ही नज़र आते हैं क्योंकि फाइलेरिया के कीटाणुओं का जीवन चक्र के पांच चरण होते हैं और इसी के अनुसार फाइलेरिया के भी पांच चरण बन जाते हैं। इन सभी चरणों को पूरा होने में कई वर्ष बीत जाते हैं। इस बारे में विस्तृत जानकारी हम आगे देंगे। फाइलेरिया को फीलपांव और श्लीपद के नाम से भी जाना जाता है। भारत में फाइलेरिया के मरीजों की संख्या सबसे ज्यादा है। यहां देसी हैल्थ क्लब स्पष्ट करता है कि फाइलेरिया आनुवांशिक रोग नहीं है। 

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फाइलेरिया के प्रकार – Types of Filariasis

फाइलेरिया तीन प्रकार की होती है। विवरण निम्न प्रकार है –

1. लिम्फेटिक फाइलेरिया (Lymphatic Filariasis) या एलीफेंटिएसिस (Elephantiasis) – यह सबसे आम प्रकार का फाइलेरिया होता है। इसके लिये वुकेरेरिया बैन्क्रॉफ्टी, ब्रुगिया मलाई और ब्रुगिया टीमोरि नामक परजीवी जिम्मेदार होते हैं। इसमें लिम्फ नोड्स और लसीका प्रणाली  प्रभावित होती है। एडीमा की समस्या के साथ त्वचा के ऊपर और नीचे के ऊतकों का मोटा हो जाना, बाहों, गुप्तांगों, ब्रेस्ट और अंडकोष में सूजन इसके लक्षण हो सकते हैं।  

2. सबक्यूटेनियस फाइलेरिया (Subcutaneous Filariasis) – इसमें त्वचा की नीचे की परत प्रभावित होती है और इसके लिये लोआ लोआ (आई वॉर्म), मैनसनैला स्ट्रेप्टोसेरका और ओन्कोसेरका वॉल्वुलस  नामक परजीवी जिम्मेदार होते हैं। यह फाइलेरिया का दुर्लभ प्रकार है। त्वचा पर लाल चकत्ते होना, त्वचा का रंग बदलना और रिवर ब्लाइंडनेस (River Blindness – एक प्रकार के परजीवी कृमि आंकोसेरा वाल्वलस के संक्रमण से होने वाला रोग जिसके कारण त्वचा और आंखों में गंभीर खुजली, दाने और अंधेपन की संभावना रहती है) जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

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3. सीरस केविटी फाइलेरिया (Serous Cavity Filariasis) – यह पेट की सीरियस कैविटी को प्रभावित करता है। पेट में दर्द तथा त्वचा पर लाल चकत्ते होना इसके लक्षण हो सकते हैं। यह भी फाइलेरिया का दुर्लभ प्रकार है। इस पर अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। 

ये भी पढ़े – डेंगू के घरेलू उपाय

फाइलेरिया के चरण – Stages of Filariasis

दोस्तो, फलेरिया के कीटाणुओं के जीवन के पांच चक्र होते हैं इसी के अनुसार फाइलेरिया रोग पांच चरण बन जाते हैं। विवरण निम्न प्रकार है – 

1. पहला चरण (First Stage)- वयस्क मादा परजीवी नर कृमि से जुड़ने के बाद, लाखों की संख्या में सूक्ष्मफाइलेरिया का जन्म होना।  

2. दूसरा चरण (Second Stage)- मध्यवर्ती होस्ट (Host), वेक्टर (Vector) कीड़े सूक्ष्मफाइलेरिया का सेवन कर लेते हैं।

3. तीसरा चरण (Third Step)- फिर ये मध्यवर्ती होस्ट तीसरे चरण में परिवर्तित हो जाते हैं। 

4. चौथा चरण (Fourth Stage)- ये वेक्टर कीड़ें संक्रमित लार्वा अर्थात् कीड़े के बच्चों की त्वचा की परत में संचरित होते हैं।  

5. पांचवा चरण (Fifth Stage)- एक वर्ष बाद यही लार्वा वयस्क कीड़े बन जाते हैं। 

इन सभी चरणों की गतिविधियां मरीज के खून में ही होती हैं। इसीलिये पहले चरण से लेकर अंतिम चरण तक के सफर में कई वर्ष बीत जाते हैं। इसीलिये इसके लक्षण कई वर्षों के बाद प्रकट होते हैं। 

फाइलेरिया के कारण – Cause of  Filariasis

दोस्तो, इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि फाइलेरिया नामक बीमारी फ्युलेक्स तथा मैनसोनाइडिस प्रजाति के मच्छरों के काटने से फैलती है। मच्छर, काटने पर एक धागे समान “फाइलेरिओडी” (Filarioidea) नामक निमेटोड कीड़ों परजीवी को हमारे में छोड़ देता है। इसके आठ प्रकार के निमेटोड ज्ञात हैं जो मनुष्यों को अपना शिकार बनाते हैं। प्रत्येक मादा वयस्क परजीवी नर कृमि से जुड़ने के बाद, लाखों की संख्या में सूक्ष्मफाइलेरिया नामक भ्रूणों की पीढ़ियों को जन्म देती है। 

2. परजीवी मच्छरों के अतिरिक्त कुछ अन्य रक्त पीने वाले कीड़ों के जरिए एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। फाइलेरिया का कारण बनने वाले कुछ अन्य कीड़ों के नाम निम्नलिखित हैं –

(i)   बैन्क्रॉफ्टी (Wuchereria Bancrofti)

(ii)  ब्रुगिया मलाई (Brugia Malayi)

(iii) ब्रुगिया टीमोरि (Brugia Timori)

(iv) मैनसोनेल्ला (Mansonella) (6) (7)

(v) ओन्कोसेरका वॉल्वुलस (Onchocerca volvulus)

फाइलेरिया के लक्षण – Symptoms of Filariasis

फाइलेरिया के लक्षण तुरंत दिखाई नहीं देते, इनको प्रकट होने में कई वर्ष लग सकते हैं, लगभग 7, 8 वर्ष के बाद भी लक्षण दिखाई दे सकते हैं। इस बीमारी के लक्षण फाइलेरिया के प्रकार के हिसाब से भी बदल सकते हैं। हम बता रहे हैं फाइलेरिया के कुछ सामान्य लक्षण जो निम्न प्रकार हैं –

1. मरीज के पैर फूल कर मोटे हो जाते हैं हाथी के पैर के समान।

2. पैर के अतिरिक्त हाथ, स्तन व गुप्तांग में सूजन आ सकती है।

3. हाइड्रोसील (Hydrocele) अंडकोष में होने वाली सूजन)।

4. त्‍वचा मोटी हो सकती है और दर्द भी हो सकता है। 

5. बार-बार बुखार आ सकता है। 

फाइलेरिया का निदान – Diagnosis of Filariasis

फाइलेरिया की जांच के लिये निम्नलिखित प्रक्रियाओं का उपयोग किया जा सकता है –

1. ब्लड टेस्ट (Blood Test)- खून में माइक्रोफिलेरिया को देखने के लिये ब्लड सेंपल की सूक्ष्म जांच की जाती है। ये ब्लड सेंपल रात के समय जब व्यक्ति गहरी नींद में सोया हुआ होता है तब लिया जाता है क्योंकि जो माइक्रोफिलेरिया लिंफ़ के (लिम्फेटिक) फिलेरिया का कारण होता है वह खून में रात को प्रसार करता है। इससे परिणाम में इन कीड़ों की संख्या का अनुमान अधिक से अधिक सटीक आये। 

2. इम्यूनोडायग्नोस्टिक टेस्ट (Immunodiagnostic Tests) – खून में एंटीबॉडीज़ की जांच के लिये यह टेस्ट किया जाता है कि खून में एंटीबॉडीज़ हैं या नहीं। 

3.  खून में फाइलेरिया परिसंचरण करने वाला प्रतिजन (Circulating Filarial Antigen) है या नहीं इसका पता लगाने के लिये टेस्ट किया जाता है। 

फाइलेरिया उन्मूलन – Filariasis Eradication

फाइलेरिया को नियंत्रित करने और इसका उन्मूलन करने हेतु भारत सरकार ने फाइलेरिया ने फाइलेरिया उन्मूलन नामक का कार्यक्रम चलाया है।  इस कार्यक्रम के अंतर्गत फाइलेरिया चिकित्सालयों के टीम सायं 7 से रात 12 बजे तक प्रत्येक परिवार में जाते हैं और परिवार के प्रत्येक सदस्य की उंगुली में सुई चुभोकर बल्ड सेंपल लेते हैं। अगले दिन ये कर्मचारी फिलपांव रोग के कीटाणु पाये जाने वाले व्यक्तियों को दवाई देते हैं। यह दवा निशुल्क होती है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत सार्वजनिक दवा सेवन (M.D.A.) किया जाता है, जिसमें D.E.C. (Diethylcarbamazine) नामक दवा की एक खुराक वर्ष में एक बार लोगों को खिलाई जाती है। इस दवा की एक खुराक चार से छह साल तक के लिये साल में एक बार दी जाती है क्योंकि फाइलेरिया कीटाणुओं की औसतन आयु 4 से 6 वर्ष की होती है। यह दवा मच्छरों के काटने से खून में फाइलेरिया के कीटाणुओं को खत्म कर देती है।

ये भी पढ़े – मलेरिया के घरेलू उपचार 

D.E.C दवा की खुराक की मात्रा – D.E.C Dosage of the Drug

आयु के अनुसार डी।ई।सी दवा की खुराक की मात्रा निम्न प्रकार है :- 

(i)  2 वर्ष से 5 वर्ष तक 

1 गोली 100 मिलीग्राम

(ii) 6 वर्ष से 14 वर्ष   

2 गोली 100 मिलीग्राम

(iii) 14 वर्ष और इससे अधिक

3 गोली 100 मिलीग्राम

D.E.C दवा किन को नहीं दी जानी चाहिए? – Who should not be given D.E.C Medicine?

डी.ई.सी दवा के लिये कुछ ध्यान रखने वाली बातें निम्न प्रकार है – 

1. यह दवा कभी भी खाली पेट नहीं खानी चाहिये।

2. दो वर्ष से कम आयु वाले बच्चे को यह दवा नहीं दी जानी चाहिये।

3. गर्भवती महिलाओं को यह दवा नहीं दी जानी चाहिये। 

4. गंभीर रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को बिना डॉक्टर की सलाह के यह दवा नहीं खानी चाहिये।

फाइलेरिया के घरेलू उपाय – Home Remedies for Filariasis

दोस्तो, अब बताते हैं आपको फाइलेरिया के कुछ घरेलू उपाय जो निम्न प्रकार हैं –

1. सोंठ (Dry Ginger)- सूखी हुई अदरक को सोंठ कहा जाता है। सोंठ में एंटीइंफ्लामेटरी और एंटीबैक्टीरियल गुण मौजूद होते हैं जो सूजन को कम करते हैं और बैक्टीरियल इंफेक्शन से हमारा बचाव। फाइलेरिया के उपचार के लिये सोंठ का पाउडर बनाकर एक चम्मच रोजाना गर्म पानी के साथ सेवन करें। इससे शरीर के अंदर परजीवी खत्म हो जायेंगे जिससे मरीज को आराम लग जायेगा।

2. लौंग(Cloves) – लौंग फाइलेरिया के उपचार के लिये अत्यंत  प्रभावशाली उपाय माना जाता है। लौंग में एंटीमाइक्रोबियल, एंटीऑक्सीडेंट, एंटीवायरल, एंटीइंफ्लेबल और एनाल्जेसिक गुण पाये जाते हैं।  इसमें मौजूद एंजाइम परजीवी को पनपते से रोकते हैं और उनको खत्म कर देते हैं। मरीज के आहार में लौंग को शामिल करें और मरीज लौंग वाली चाय का भी सेवन करे। लौंग पर विस्तार से जानकारी के लिये हमारा पिछला आर्टिकल “लौंग के फायदे और नुकसान पढ़ें।

3. काले अखरोट का तेल (Black Walnut Oil)- एक कप गर्म पानी में काले अखरोट के तेल की तीन, चार बूंद डालकर पीयें। कम से कम छः हफ्ते तक दिन में दो बार पीयें। काले अखरैट के तेल के गुण रक्त में मौजूद परजीवी को खत्म करने का काम करते हैं। 

4. आँवला (Amla)- आँवला विटामिन-सी का उत्तम श्रोत है। इसमें एन्थेलमिंथिंक भी मौजूद होता है जो घाव को जल्दी भरने में मदद करता है। इसके एंटी-इन्फ्लामेटरी गुण सूजन को कम करते हैं। इसके रोजाना खाने से इंफेक्शन खत्म होता है।  फाइलेरिया के मरीजों को अपने भोजन में आँवला को शामिल करना चाहिये।

5. अश्वगंधा (Ashwagandha)- अश्वगंधा औषधीय गुणों से भरपूर होता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट, एंटीइंफ्लेमेटरी, एंटीस्ट्रेस, एंटीटयूमर, एंटीबैक्टीरियल, एंटीवायोटिक गुण होते हैं। इसके एंटीइंफ्लेमेटरी गुण सूजन को कम करते हैं और एंटीबैक्टीरियल गुण बैक्टीरिया को खत्म करने में मदद करते हैं। फाइलेरिया के लिये अश्वगंधा के चूर्ण या कैप्सूल का इस्तेमाल किया जा सकता है। अश्वगंधा पर विस्तृत जानकारी के लिये हमारा पिछला आर्टिकल “अश्वगंधा के फायदे और नुकसान पढ़ें। 

6. अगर (Agarwood) – फाइलेरिया के उपचार के लिये अगर को पानी के साथ मिलाकर पेस्ट बना लें और इसे रोजाना दिन में दो बार प्रभावित स्थान पर लगायें। लगभग 20 मिनट बाद इसे साफ़ कर लें। इससे सूजन कम होगी, घाव जल्दी भरेगा और बैक्टीरिया भी खत्म हो जायेंगे।  

7. सेंधा नमक (Rock Salt)- सेंधा नमक सबसे शुद्ध नमक माना जाता है। इसमें 90 से अधिक खनिज होते हैं। सेंधा नमक का उपयोग कई बीमारियों के उपचार में किया जाता है। फाइलेरिया के लिये शंखपुष्पी और सौंठ के पाउडर में सेंधा नमक मिलायें और प्रतिदिन दो बार एक चुटकी की मात्रा में गर्म पानी के साथ सेवन करें।

8. ब्राह्मी (Brahmi)- ब्राह्मी में एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-इंफ्लेमेटरी व एंटीकॉन्वेलसेंट गुण मौजूद हाेते हैं। यह जड़ी बूटी अनेक बीमारियों के उपचार में काम आती है। फाइलेरिया के उपचार के लिये रोजाना ब्राह्मी के लेप को प्रभावित त्वचा पर लगायें। इससे सूजन कम हो जायेगी। 

9. शंखपुष्पी (Conchpushpi)- शंखपुष्पी की जड़ को गर्म पानी के साथ पीसकर पेस्ट बनाकर इसे प्रभावित स्थान पर लगायें।  इससे सूजन कम हो जायेगी। 

10. कुल्ठी (Pot)- कुल्ठी या हॉर्स ग्राम में चींटियों द्वारा निकाली गई मिट्टी और अंडे के सफेद हिस्से को मिलाकर प्रतिदिन प्रभावित त्वचा पर लगायें। इससे सूजन कम हो जायेगी। 

11. भोजन (Food)- फाइलेरिया के मरीजों को अपने आहार में विटामिन-ए युक्त खाद्य पदार्थों को शामिल करना चाहिये जैसे अनानास, मीठे आलू, शकरकंदी, गाजर, खुबानी और लहसुन आदि विटामिन-ए में बैक्टरीरिया खत्म करने के  विशेष गुण मौजूद होते हैं। विटामिन-ए के अतिरिक्त प्रोटीन युक्त भोजन करें और पेय पदार्थों का अधिक सेवन करें। 

कुछ सावधानियां – Some Precautions

फाइलेरिया से पीड़ित व्यक्ति को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिये – 

1. प्रतिदिन साफ़ पानी और साधारण साबुन से पैर को धोना चाहिये।

2. पैर को साफ़ करते समय ब्रश का उपयोग ना करें क्यों कि इससे पैर में घाव हो सकता है। 

3. मुलायम और साफ कपड़े से पैर को पोंछें।

4. घाव को कभी ना खुजायें। इश पर रोजाना दवा लगायें। 

5.  पैर को आरामदायक स्थिति में ही उठायें। जल्दबाजी ना करें। 

6. कहीं भी, कभी भी जितना संभव हो, व्यायाम करें। पैदल चलना इसके लिये अच्छा व्यायाम है।

7. बुखार और दर्द की स्थिति में व्यायाम  न करें क्योंकि यह हानिकारक हो सकता है।

8. पीड़ित व्यक्ति यदि हृदय रोगी हैं तो व्यायाम से पहले अपने डॉक्टर से सलाह ले ले कि उसे व्यायाम करना चाहिये या नहीं। 

9. तीव्र दर्द या बुखार की स्थिति में पीड़ित व्यक्ति को तुरंत अपने निकटतम स्वास्थ्य केंद्र से सम्पर्क करना चाहिये।

10. मच्छरों से बचाव करें। मच्छर वाले स्थान पर जाने से बचें। 

फाइलेरिया से बचाव – Protection Against Filariasis 

मूलतः फाइलेरिया रोग मच्छर के काटने से होता है, अतः फाइलेरिया से बचाव के लिये ऐसे उपाय करने चाहियें जिनसे मच्छर पैदा ना हो जैसे    कि – 

1. अपने घर की सफाई रखें। घर के फर्श की सफाई करने के लिये पानी में फिनायर, डिटौल, लाईजोल आदि मिलायें।

2. रसोई, वाशरूम सूखे और साफ़ रखें।

3. पीने का पानी ढंक कर रखें। 

4. पानी की टंकी भी ढंकी हुई होनी चाहिये।

5. कूलर का पानी 2 या 3 दिन में बदलना चाहिये। 

6. गमलों में पानी जमा ना हो।  

7. घर के आसपास की सफाई का भी ध्यान रखें। कहीं विशेषकर नालियों में पानी जमा ना होने दें। नगर निगम से एंटी लार्वा का छिड़काव करवाते रहें।

8.  हाथ-पैर और शरीर के खुले हिस्सों पर मच्छर भगाने वाली क्रीम लगाकर सोयें। या मच्छरदानी लगाकर सोयें। 

9. पूरे कपड़े पहनें। जिससे शरीर के अधिकांश भाग ढक जायें। 

10. मच्छरों को भगाने के लिये घर में गुग्गुल या नीम के पत्ते जलायें।

Conclusion – 

दोस्तो, आज के आर्टिकल में हमने आपको फाइलेरिया के बारे में विस्तार से जानकारी दी। फाइलेरिया क्या है, फाइलेरिया के प्रकार, फाइलेरिया के चरण, फाइलेरिया के कारण, फाइलेरिया के लक्षण, फाइलेरिया का निदान, फाइलेरिया उन्मूलन, डी।ई।सी दवा की खुराक की मात्रा और डी।ई।सी दवा किनको नहीं दी जानी चाहिये, इन सब के बारे में भी विस्तार पूर्वक बताया। देसी हैल्थ क्लब ने इस लेख के माध्यम से फाइलेरिया के फायदे बताये, कुछ सावधानियां बताईं और फाइलेरिया से बचाव के तरीके भी बताये। आशा है आपको ये आर्टिकल अवश्य पसन्द आयेगा। 

दोस्तो, इस आर्टिकल से संबंधित यदि आपके मन में कोई शंका है, कोई प्रश्न है तो आर्टिकल के अंत में, Comment box में, comment करके अवश्य बताइये ताकि हम आपकी शंका का समाधान कर सकें और आपके प्रश्न का उत्तर दे सकें। और यह भी बताइये कि यह आर्टिकल आपको कैसा लगा। आप इस पोस्ट को अपने दोस्तों और सगे – सम्बन्धियों के साथ भी शेयर कीजिये ताकि सभी इसका लाभ उठा सकें। दोस्तो, आप अपनी टिप्पणियां (Comments), सुझाव, राय कृपया अवश्य भेजिये ताकि हमारा मनोबल बढ़ सके। और हम आपके लिए ऐसे ही Health-Related Topic लाते रहें। धन्यवाद।

Disclaimer – यह आर्टिकल केवल जानकारी मात्र है। किसी भी प्रकार की हानि के लिये ब्लॉगर/लेखक उत्तरदायी नहीं है। कृपया डॉक्टर/विशेषज्ञ से सलाह ले लें।

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