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दोस्तो, स्वागत है आपका हमारे ब्लॉग पर। दोस्तो, हम सब अपनी ज़िन्दगी में कुछ ना कुछ भूलते रहते हैं जैसे कभी हम अपना पर्स भूल गये, चश्मा भूल गये, रुमाल भूल गये, कोई डाक्युमेंट भूल गये, किसी से मिलना भूल गये, किसी को कॉन्टैक्ट करना भूल गये  दवाई खाना भूल गये, वगैरा-वगैरा। ये सब सामान्य घटनाएं हैं जोकि रोज-रोज नहीं होतीं। परन्तु जब ये रोजाना होने लगे या हम बहुत बड़ी बात भूलने लगें जैसे कि अपने घर का पता, अपना फोन नंबर या अपने ही परिवार के किसी सदस्य को अथवा किसी खास रिश्तेदार को ही भूल जायें या हमें यह भी याद ना आये कि मैंने आज खाना खाया भी है या नहीं, तो समझिये कि निश्चित रूप से यह बहुत बड़ी बात है, बहुत बड़ी समस्या है और इस समस्या को कहते हैं “भूलने का रोग”। इसे मेडिकल भाषा में “अल्जाइमर” कहा जाता है जोकि अधिकतर 60 वर्ष या इससे अधिक आयु वाले व्यक्तियों में पाया जाता है। तभी तो आपने भी कभी ना कभी किसी बुजुर्ग को गलियों में भटकते हुए देखा होगा कि वे कहते हैं कि मेरा घर खो गया है, पता नहीं कहां पर है। दोस्तो, यह एक न्यूरोलॉजिकल विकार है, एक ऐसा रोग है जिसका कोई इलाज नहीं, केवल इसके लक्षणों को कम किया जा सकता है। दोस्तो, यही विकार है हमारा आज का टॉपिक “अल्जाइमर क्या है”। 

देसी हैल्थ क्लब इस आर्टिकल के माध्यम से आज आपको अल्जाइमर के बारे में विस्तार से जानकारी देगा और यह भी बतायेगा कि इसके प्रभाव को कम करने के लिये क्या घरेलू उपाय हैं। तो, सबसे पहले जानते हैं कि अल्जाइमर क्या है, डिमेंशिया और अल्जाइमर में अंतर और अल्जाइमर के चरण। फिर इसके बाद बाकी बिन्दुओं पर जानकारी देंगे।

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अल्जाइमर क्या है?
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अल्जाइमर क्या है? – What is Alzheimer’s

अल्जाइमर एक न्यूरोलॉजिकल विकार है जिसमें मस्तिष्क की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होकर नष्ट होने लगती हैं जिसका सीधा प्रभाव स्मरण शक्ति पर पड़ता है अर्थात् स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है जिससे दैनिक कार्य कलाप तथा गतिविधियां प्रभावित होती हैं। इसीलिये  इसे “भूलने का रोग” कहा जाता है। यहां हम स्पष्ट कर दें कि मस्तिष्क में एक सौ अरब तंत्रिका कोशिकाएं (Neuron) होती हैं जो अन्य कोशिकाओं से कम्युनिकेट करके एक नेटवर्क बनाती हैं  इस नेटवर्क की कोशिकाएं   सोचने, सीखने और याद रखने का काम करती हैं तो अन्य कोशिकाएं देखने, सुनने, सूंघने, मांसपेशियों के संचालन में मदद करती हैं। मस्तिष्क की कोशिकाएं किसी लघु उद्योग के समान कार्य करती हैं। शरीर के संचालन के समन्वय (Coordination) के लिये ऑक्सीजन और  एनर्जी की जरूरत होती है। 

मस्तिष्क की कोशिकाएं एनर्जी उत्पन्न करती हैं, नई कोशिकाओं का निर्माण करती हैं और अनुपयुक्त चीजों को बाहर निकाल देती हैं। ये कोशिकाएं सूचनाओं को इकट्ठा करके प्रोसेस करती हैं। मस्तिष्क की इन स्नायु कोशिकाओं को क्षति पहुंचाने और नष्ट करने का प्लेक (Plaque) और टैंगल (Tangle) नामक तत्व करते हैं। प्लेक और टैंगल, सीखने या याद रखने की क्षमता  वाले क्षेत्र में अधिक बनते हैं जो बाद में अन्य जगहों पर फैल जाते हैं। अल्जाइमर की समस्या आमतौर पर 60 वर्ष या इससे अधिक आयु वाले व्यक्तियों में होती है। आरम्भिक अवस्था में इसका पता ही नहीं चलता परन्तु बाद में यह गंभीर समस्या बन जाती है। पहली बार अल्जाइमर की पहचान 1906 में एक जर्मन चिकित्सक एलोइस अल्जाइमर ने एक महिला के मस्तिष्क पर एक शव परीक्षण के दौरान जो गंभीर मैमोरी लोस और भ्रम से पीड़ित थी। इन्हीं जर्मन चिकित्सक के नाम पर इस रोग का नाम अल्जाइमर रोग रखा गया।  

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डिमेंशिया और अल्जाइमर में अंतर – Difference Between Dementia and Alzheimer’s 

दोस्तो, सबसे पहले तो हम यहां स्पष्ट कर दें कि लोगबाग डिमेंशिया और अल्जाइमर को एक ही समझते हैं अर्थात् उनका मानना है कि अल्जाइमर का दूसरा नाम डिमेंशिया है जबकि ऐसा कतई नहीं है। यद्यपि इन दोनों के लक्षण एक जैसे हो सकते हैं परन्तु ये दोनों एक नहीं हैं बल्कि अलग-अलग हैं। निम्नलिखित विवरण से इनके बीच का विवरण स्पष्ट हो जाता है –

डिमेंशिया Dementia

(i) डिमेंशिया यानि मनोभ्रंश नाम का कोई रोग नहीं है अपितु यह एक सिंड्रोम है जिसमें कई या किसी विशेष रोग के कईं लक्षणों का एक साथ हो सकते हैं। 

(ii) “डिमेंशिया” एक संपूर्ण शब्द है जिसमें स्मरण शक्ति के साथ-साथ दिनचर्या के कार्य कलाप, उनकी समस्याएं, संवाद और संचार क्षमता आदि शामिल होते हैं। डिमेंशिया इन सभी को प्रभावित करती है। इससे व्यक्तित्व में परिवर्तन और दैनिक गतिविधियों में परेशानियां नोटिस की जाती हैं। 

(iii) डिमेंशिया के कई प्रकार होते हैं जैसे लेवी बॉडीज़ डिमेंशिया, वैस्कुलर डिमेंशिया, पार्किंसंस रोग, फ्रंटोटेमपोरल डिमेंशिया आदि। 

अल्जाइमर –  Alzheimer’s

(i) अल्जाइमर एक रोग है जो न्यूरोलॉजिकल अर्थात् मस्तिष्क संबंधी विकार है। 

(ii) इस रोग के लक्षणों में समय और उम्र के साथ स्मरण शक्ति का क्षीण हो जाना, निर्णय लेने में, बोलने में दिक्कत आना या पारिवारिक तथा सामाजिक समस्याओं की गंभीर स्थिति आदि शामिल हैं।

(iii) सबसे प्रमुख अंतर यह है कि अल्जाइमर स्वयं, डिमेंशिया का सबसे सामान्य प्रकार है। 

अल्जाइमर रोग के चरण – Stages of Alzheimer’s Disease

इस विषय पर विशेषज्ञ एक मत नहीं हैं। कोई सात चरण बताता है तो कोई चार परन्तु वास्तव में इसके तीन चरण होते हैं। विवरण निम्न प्रकार है –

1. प्रारंभिक चरण (Early Stages)- प्रारंभिक चरण में अल्जाइमर के लक्षण खुल कर सामने नहीं आते हैं। कभी-कभी भूलने जैसी बात हो जाती है। व्यक्ति को इतना तो याद रहता है कि वह कुछ भूल रहा है, मगर क्या भूल रहा है यह जल्दी से याद नहीं आता। कुछ देर बाद याद आ जाता है कि वह क्या भूल रहा है। कभी-कभी कोई वस्तु या दस्तावेज कहीं रखकर भूल जाता है। परिवार के किसी सदस्य द्वारा कही गई बात याद नहीं आती तो कभी कोई जगह भूल जाता है। ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति को और अन्य लोगों को छोटी-मोटी परेशानी हो जाया करती है मगर समस्या गंभीर नहीं होती। वह व्यक्ति अपनी दैनिक कार्य अच्छी तरह कर लेता है, ड्राइव भी कर लेता है और उसका कार्य/व्यवसाय प्रभावित नहीं होता। 

2. मध्यम चरण (Middle Stage)- अल्जाइमर रोग के इस चरण में पीड़ित व्यक्ति की देखभाल की जरूरत पड़ जाती है क्योंकि यह चरण सबसे लंबा होता है जो कई वर्षों तक चल सकता है। इस अवस्था में व्यक्ति शब्दों को सही से समझ नहीं पाता है और निर्णय लेने में असमर्थ होता है। उसे बात समझने में किसी की मदद की जरूरत होती है। उसे अपने दैनिक कार्य करने में भी दिक्कत आती है। अपने बारे में अपने पिछले इतिहास के बारे में भूलना, अपना मकान नम्बर, पता, लोकेलिटी भूल जाना, अपना ही टेलीफोन नम्बर भूल जाना, संदिग्धता और भ्रम की स्थिति, व्यवहार में बदलाव आदि इस चरण के मुख्य लक्षण होते हैं। 

3. अंतिम चरण (Last Stage)- अल्जाइमर का तीसरा यानि अंतिम चरण मरीज के लिये हमेशा जोखिम भरा होता है उसे हर समय मदद की जरूरत होती है। परिवार में किसी ना किसी को उसकी दैनिक गतिविधियों पर नज़र रखनी पड़ती है, उसे व्यक्तिगत देखभाल के लिये भी किसी की सहायता की आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि मस्तिष्क की कोशिकाएं भारी मात्रा में क्षतिग्रस्त होकर मर चुकी होती हैं, परिणामस्वरूप उसकी स्मरण क्षमता और संज्ञानात्मक कौशल लगभग समाप्त हो जाते हैं इससे उसके व्यक्तित्व में अवांछित (undesired) परिवर्तन आ जाता है। 

वह किसी से बातचीत जारी रखने, अपनी गतिविधिओं पर काबू रखने या किसी विषय पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने में असमर्थ होता है। ऐसी अवस्था में किसी संक्रमण या निमोनिया का खतरा बढ़ जाता है, उसे भोजन निगलने में भी दिक्कत होती है और चलने, फिरने, उठने, बैठने में भी परेशानी होती है। आरंभिक चरण से अंतिम चरण में अंतर इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि आरंभिक चरण में व्यक्ति यह भूल जाता है कि उसने क्या खाया परन्तु अंतिम चरण में वह, यह भूल जाता है कि उसने खाना खाया भी या नहीं। 

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अल्जाइमर रोग के कारण – Cause of Alzheimer’s Disease

माना जाता है कि अल्जाइमर का कोई प्रमाणिक और सटीक कारण अज्ञात है, फिर भी इसके कुछ निम्नलिखित संभावित कारण हो सकते हैं –

1. सबसे प्रमुख कारण यह माना जाता है कि प्लेक और टैंगल नामक ये दो तत्व मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं जिससे ये कोशिकाएं मरने लगती हैं परिणामस्वरूप स्मरण शक्ति कमजोर होने लगती है। 

2. मस्तिष्क और नर्वस सिस्टम की तंत्रिका कोशिकाओं का क्षतिग्रस्त होकर नष्ट हो जाने से काम न करना। 

3. नींद पूरी ना हो पाना। लम्बे समय में यह अल्जाइमर की वजह बन सकती है।

4. ताउ प्रोटीन (Tau protein) और बीटा-एमीलॉइड (β-Amyloid) अमीनो एसिड का मस्तिष्क में जमा हो जाना। 

5. ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस भी अल्जाइमर का एक कारण बन सकता है। 

6. असामान्य न्यूरॉनल प्रक्रियाएं यानि न्यूरोपिल थ्रेड (neuropil thread)।

7. सिनैप्स लॉस (Synapse Loss)। सिनैप्स न्यूरॉनल एक जंक्शन होता है, जिसके जरिये न्यूरॉन्स एक दूसरे से संवाद करते रहते हैं।

अल्जाइमर के लक्षण – Symptoms of Alzheimer’s

अल्जाइमर रोग में निम्नलिखित लक्षण स्पष्ट नजर आते हैं –

1. स्मरण शक्ति, सोचने समझने की शक्ति का कमजोर पड़ना। कई बार याद करे की बार-बार कोशिश करने पर भी याद ना आना।

2. स्मरण शक्ति ठीक होते हुए भी कोई पुरानी बात, घटना, सूचना आदि का पुनःस्मरण (Recall) ना हो पाना।

3. व्यक्तित्व, आचार और व्यवहार में परिवर्तन।

4. परिवार के सदस्यों को या अन्य बाहर वाले व्यक्ति को ना पहचानना।

5. बौद्धिक गतिविधियों का कम हो जाना। 

6. बोलने और समझने में परेशानी होना।

7. समय और स्थान को लेकर भ्रमित होना अथवा पहचान ना पाना।

8. निर्णय लेने, प्रतिक्रिया व्यक्त करने की क्षमता का कम हो जाना या पूरी तरह समाप्त हो जाना।

9. वस्तुओं, दस्तावेजों के बारे में ना समझ पाना या इनके खोते रहना।

10. आत्मविश्वास, आत्मबल में कमी आना। 

अल्जाइमर रोग की जांच – Alzheimer’s Disease Screening 

दोस्तो, अल्जाइमर की जांच करना आसान नहीं होता क्यों कि शुरुआत में इसके लक्षण सामने नहीं आते हैं। जैसे-जैसे समस्या बढ़ती है इसके लक्षण दिखाई देने लगते हैं। शारीरिक परीक्षण और तंत्रिका तंत्र की जांच के द्वारा इसका निदान किया जा सकता है। इसके लिये डॉक्टर निम्नलिखित उपाय अपना सकते हैं –

1. शारीरिक परीक्षण (Physical Test)- इसके लिये डॉक्टर मरीज के शरीर परीक्षण करते हैं। फिर मरीज की पिछली मेडिकल हिस्ट्री के बारे में मरीज से या उसके परिवार वालों से जानकारी लेते हैं। इसके अतिरिक्त डॉक्टर मरीज से, मरीज की दिनचर्या, दैनिक कार्य करने में परेशानी, व्यवसाय, वर्तमान में रोग और दवाइयों, के बारे में जानकारी लेते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ व्यक्तिगत जानकारी भी ली जा सकती है जैसे कि विवाह के बारे में, सेक्स लाइफ़ के बारे में, रहने की स्थिति, जीवन की छोटी बड़ी महत्वपूर्ण घटनाएं आदि। 

2. मानसिक परीक्षण (Mental Test) – मानसिक परीक्षण के लिये मरीज की मानसिक स्थिति का जायजा लेते हैं, कुछ जानकारियां ली जाती हैं जैसे स्ट्रैस, डिप्रेशन या अन्य कोई मानसिक समस्या। इसके अतिरिक्त पारिवारिक इतिहास और अनुवांशिक बीमारी की जानकारी ली जाती है। एक छोटा सा टेस्ट किया जा सकता है जिससे किसी समस्या को सुलझाने की कुशलता, गिनती करने का कौशल और समृति आदि का परीक्षण हो जाता है। 

3. सीटी स्कैन (CT Scan)- सीटी स्कैन के जरिये शरीर की इमेज ली जाती हैं जिनको कंप्यूटर एक श्रृंखला में बदल देता है। सीटी स्कैन के जरिये अल्जाइमर के बाद के चरणों में सामान्य मस्तिष्क के परिवर्तन देखे जा सकते हैं।

4. एमआरआई (MRI)- एमआरआई के जरिये यह जानने में मदद मिलती है कि अल्जाइमर, ट्यूमर या स्ट्रोक के कारण तो नहीं है। अल्जाइमर के कारण मस्तिष्क में होने वाले परिवर्तनों को देखने में मदद मिलती है। एमआरआई के जरिये शरीर की बहुत ही स्पष्ट इमेज मिलती हैं।

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अल्जाइमर का उपचार – Alzheimer’s Treatment

दोस्तो, अल्जाइमर एक ऐसा रोग है जिसके उपचार के लिये कोई विशेष दवा नहीं बनी अर्थात् इसका कोई इलाज नहीं है। एम्स के सीनियर साइकेट्रिस्ट प्रोफेसर डॉ़ राजेश सागर का कहना कि “यूथ अल्जाइमर से बचे हुए हैं, क्योंकि यह एक ओल्ड ऐज ग्रुप का रोग है। इसका कोई स्पेसिफिक ट्रीटमेंट नहीं है जिससे कि अल्जाइमर को खत्म किया जा सके। यह निरन्तर बढ़ने वाला रोग है। कुछ दवाओं से इसके बढ़ने की गति को थोड़ा कम किया जा सकता है, परन्तु बढ़ने से रोका नहीं जा सकता”। अतः डॉक्टर, अल्जाइमर के बढ़ने की गति को कम करने और लक्षणों को कम करने के लिये निम्नलिखित दवाएं लेने की सलाह दे सकते हैं – 

(i) कोलिनेस्टेरेज इनहिबिटर (Cholinesterase Inhibitors) दवाई लेने की सलाह दी जा सकती है।

(ii) ग्लूटामेट केमिकल कंपाउंड को नियंत्रित करने वाली दवाई लेने की सलाह दी जा सकती है क्योंकि ग्लूटामेट का अधिक मात्रा में उत्पादन होने से ब्रेन सेल्स डेड हो सकते हैं, जोकि अल्जाइमर का जोखिम कारक है। 

(iii) एन-मिथाइल डी-एस्पिरेट एंटागोनिस्ट (N-Methyl D-Aspirate Antagonist) लेने को भी कहा जा सकता है। 

अल्जाइमर के घरेलू उपाय – Home Remedies of Alzheimer’s

दोस्तो, यह तो तय है कि अल्जाइमर रोग का कोई सटीक और विशेष उपचार नहीं है परन्तु निम्नलिखित घरेलू उपाय अपनाकर इसके लक्षणों को कम किया जा सकता है –

1. दालचीनी (Cinnamon)- एंटीऑक्सीडेंट गुणों से समृद्ध दालचीनी एक ऐसा मसाला है जो बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी के लिये फायदेमंद होता है, विशेषकर प्री-डायबिटिक व्यक्तियों के लिए। ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस भी अल्जाइमर का कारण होता है। दालचीनी में पाये जाने वाले फाइटोकेमिकल्स ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करके मस्तिष्क के स्वास्थ बनाये रखने में मदद करते हैं। 

ये फाइटोकेमिकल्स, अल्जाइमर रोग की वजह से मस्तिष्क में होने वाले परिवर्तन/गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं और याददास्त को बढ़ाने का काम करते हैं साथ ही पार्किंसंस रोग के जोखिम से बचाने में भी मदद करते हैं। अतः भोजन में दालचीनी का उपयोग करें।

2. केसर (Saffron) – एंटीऑक्सीडेंट्स, एंटीअल्जाइमर, एंटीइंफ्लेमेटरी आदि जैसे गुणों से भरपूर केसर, मस्तिष्क के स्वास्थ को एकदम स्वस्थ और चुस्त रखती है। केसर में मौजूद दो विशेष तत्व क्रॉकेटिन और एथेनॉल से प्राप्त अर्क में एंटीडिप्रेसेंट गुण होते हैं, जो डिप्रेशन और चिंता को दूर करते हैं। एनसीबीआई की वेबसाइट पर प्रकाशित एक शोध के बताती है कि एक दिन में 30 मिलीग्राम (दिन में दो बार 15-15 मिलीग्राम), केसर के सेवन से अल्जाइमर के मरीजों की हालत में सुधार लाया जा सकता है। 

सेरेब्रल इस्किमिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें धमनी में रुकावट के कारण मस्तिष्क में ऑक्सीजन युक्त रक्त नहीं पहुंचता, अतः मस्तिष्क के टिश्यु को नुकसान पहुंचता है। केसर का अर्क, सेरेब्रल इस्किमिया पर अपना सकारात्मक प्रभाव छोड़ता है। केसर पर अधिक जानकारी के लिये हमारा पिछला आर्टिकल “केसर के फायदे और नुकसान” पढ़ें। 

3. अश्वगंधा (Ashwagandha)- अश्वगंधा का सेवन सर्वदा सार्थक होता है विशेषकर वृद्धावस्था में। यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ के लिये अत्यंत लाभदायक है। स्ट्रैस, डिप्रेशन, चिंता आदि मस्तिष्क स्वास्थ को विशेषकर स्मरण शक्ति को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। अश्वगंधा में मौजूद सिटोइंडोसाइड्स (Sitoindosides) और एसाइलस्टरीग्लुकोसाइड्स (Acylsterylglucosides) नामक यौगिक (Compound) के कारण ही एंटी-स्ट्रेस गुण अपना प्रभाव दिखाते हुए इन सभी समस्याओं से राहत दिलाकर मस्तिष्क की रक्षा करते हैं। अश्वगंधा में मौजूद बायोएक्टिव यौगिक एंक्सियोलिटिक (Anxiolytic – एंग्जाइटी कम करने की दवा) एंटी-डिप्रेसेंट प्रभाव छोड़ता है।  

4. अखरोट (Walnut)- एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर अखरोट ओमेगा-3 फैटी एसिड और मेलाटोनिन का बेहतरीन स्रोत होता है। इसके अतिरिक्त इसमें विटामिन-ई और फ्लैवेनॉइड भी होते हैं। ये सभी मस्तिष्क के कार्यों को सुचारु रूप से चलाने में मदद करते हैं। इसमें मौजूद पोलीअनसैचुरेटेड फैट डिप्रेशन को खत्म करके स्मरण शक्ति को बढ़ाने में मदद करता है। इन सब पोषक तत्वों को प्राप्त करने के लिये अपने आहार में दो अखरोट अवश्य शामिल करें।

5. हल्दी दूध (Turmeric Milk)- एंटीबायोटिक, एंटीऑक्सीडेंट, एंटीइंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर, औषधीय गुणों से सम्पन्न हल्दी को प्राकृतिक एस्प्रिन कहा जाता है। एक गिलास दूध में एक हल्दी की गांठ या एक चम्मच हल्दी पाउडर डालकर उबालने पर यह हल्दी वाला दूध बन जाता है। आप चाहें तो इसमें एक चुटकी दालचीनी पाउडर भी मिला सकते हैं। दूध कैल्शियम से भरपूर होता है तथा अन्य गुण भी इसमें मौजूद होते हैं। दूध और हल्दी के मिलन से यह एक शक्तिशाली टॉनिक बन जाता है।

 इस हल्दी वाले दूध को “दि गोल्डन स्पाइस ऑफ इंडिया” (The Golden Spice of India) कहा जाता है। हल्दी में मौजूद करक्यूमिन (curcumin) पॉलीफेनोल कंपाउंड शरीर को अनेक रोगों से बचाता है। यह अल्जाइमर के रोकथाम में सक्रिय भूमिका निभाता है। वस्तुतः यह न्यूरॉन्स को नष्ट होने से बचाकर स्मरण शक्ति को बढ़ाने में मदद करता है। हल्दी दूध पर अधिक जानकारी के लिये हमारा पिछला आर्टिकल “हल्दी दूध पीने के फायदे” पढ़ें। 

6. डार्क चॉकलेट (Dark Chocolate)- दोस्तो, कभी आपका मूड खराब हो जाये तो डार्क चॉकलेट खा कर देखिये, एकदम जादू की तरह असर होगा। यह आपके मूड को खुशनुमा बना देगी और आप अपने अंदर एनर्जी महसूस करेंगे। एंटीऑक्सीडेंट, एंटीइन्फ्लामेट्री और एंटीओबेसिटी गुणों से भरपूर डार्क चॉकलेट में फाइबर, आयरन, ज़िंक, मैग्नीशियम, मैगनीज, कॉपर जैसे कई खनिज तथा विटामिन-ए, बी, सी, ई और के मौजूद होते हैं। 

डार्क चॉकलेट में मिल्क चॉकलेट की तुलना में अधिक कोको होता है, लगभग 50-90 प्रतिशत। कोको मूड को अच्छा बनाने के अतिरिक्त मस्तिष्क स्वास्थ्य और स्मरण शक्ति में सुधार करता है। कोकाआ में ट्रिप्टोफैन मौजूद जो कि एक अमीनो एसिड है, डिप्रेशन को कम करने में सक्रिय भूमिका निभाता है। निश्चित रूप से डार्क चॉकलेट का सेवन अल्जाइमर के लक्षणों को कम करने में मदद करेगा। डार्क चॉकलेट पर विस्तार से जानकारी के लिये हमारा पिछला आर्टिकल “डार्क चॉकलेट के फायदे” पढ़ें।

7. नारियल तेल (Coconut Oil)- नारियल तेल ऊर्जा के स्त्रोत को बढ़ावा देता है। इसमें मौजूद फैटी एसिड मस्तिष्क के कार्य सुधार करने के लिये सकारात्मक भूमिका निभाता है। यह प्रभाव कीटोन्स के साथ होता है, जो शरीर में फैट को एनर्जी में परिवर्तित करने पर होता है। ग्लूकोज, मस्तिष्क ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत होता है। अल्जाइमर रोग में मस्तिष्क की कोशिकाओं तक ग्लूकोज नहीं पहुंच पाता।

 ऐसे में शरीर में पैदा होने वाले कीटोन्स द्वारा नारियल के तेल को पचाने पर मस्तिष्क के पोषण को बनाए रखने के लिए ऊर्जा का एक वैकल्पिक स्रोत मिल जाता है। प्रतिदिन नारियल तेल का उपयोग करने से सभी आयु वर्ग के लोगों की स्मरण शक्ति में सुधार होगा। नारियल तेल का इस्तेमाल आप खाना बनाने में सिर की मालिश (हल्का गुनगुना तेल) करने के लिये कर सकते हैं। 

8. गिंको बाइलोबा (Ginkgo Biloba)- यह एक दुर्लभ जड़ी बूटी है इसे गिंको बाइलोबा, जिंको बाइलोवा या मैडेनहायर के नाम से भी जाना जाता है। इसके पत्ते, जड़ और छाल सब में औषधीय गुण होते हैं। इस जड़ी बूटी में एंटीऑक्सीडेंट, एंटीडिप्रेसेंट, एंटीइंफ्लेमेटरी और एंटीप्लेटलेट मौजूद होते हैं। इसके एंटीऑक्सीडेंट तथा औषधीय गुण मानसिक रोगों से राहत दिलाने में सक्रिय भूमिका निभाते। 

ये अल्जाइमर के लक्षणों को कम करने में मदद करते हैं। नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन की वेबसाइट पर प्रकाशित एक वैज्ञानिक शोध बताती है कि गिंको बाइलोबा से मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में सुधार हो सकता है। अल्जाइमर के लक्षणों को कम करने के लिये गिंको बाइलोबा की पत्तियों को अच्छी तरह पीस कर, छानकर, जूस निकाल कर, आधा कप जूस पीयें। डॉक्टर की सलाह पर इसके सप्लीमेंट भी लिये जा सकते हैं।

9. विटामिन-K युक्त आहार (Vitamin-K Rich Diet)- विटामिन-K, का काम, रक्त का थक्का बनाना, शरीर में रक्त प्रवाह को  बनाये रखने में मदद करना, हड्डियों को मजबूती प्रदान करना, के अतिरिक्त मस्तिष्क के कार्य में मदद करना तथा मस्तिष्क स्वास्थ को बनाये रखना,भी होता है। विशेषकर विटामिन-K1, अल्जाइमर रोग के लक्षणों को कम करके स्मरण शक्ति को बढ़ाने का काम करता है। यह अधिक आयु में भी किसी घटना या वस्तु को Recall करने की क्षमता में वृद्धि करता है। 70 वर्ष से अधिक आयु वाले कुछ व्यक्तियों पर किए गए एक अध्ययन इस बात की पुष्टि होती है। इसलिये अपने भोजन में ऐसे खाद्य पदार्थों को सम्मलित करें जिनसे विटामिन-K1 प्राप्त हो सके जैसे कि कोलार्ड साग, पालक, शलजम, गाजर, ब्रसेल्स स्प्राउट्स, ब्रोकली, कीवी, ब्लूबैरी, एवोकाडो, अनार, अंडा, मांस, मछली आदि। 

10. विटामिन-डी युक्त आहार (Vitamin-D Rich Diet)- यह नोटिस किया गया है कि अल्जाइमर रोग होने पर शरीर में विटामिन-डी, की अधिक मात्रा में कमी हो जाती है। सामान्य अवस्था में भी वृद्ध लोगों में विटामिन हो जाती है, चूंकि अल्जाइमर रोग अधिकतर वृद्ध लोगों को अधिक होता है इसलिये विटामिन-डी, की कमी अल्जाइमर के लक्षणों में वृद्धि कर सकती है। यदि इस कमी को पूरा कर दिया जाये तो, निश्चित रूप से अल्जाइमर के लक्षणों में भारी कमी आयेगी। अतः अपने भोजन में विटामिन-डी युक्त खाद्य पदार्थों को सम्मलित करें जैसे कि मशरूम, वसा युक्त मछलियां, अंडे का पीला भाग आदि। 

11. विटामिन-ई युक्त खाद्य पदार्थ ((Vitamin-E Rich Diet))- अल्जाइमर पर किये गये एक अध्ययन से पता चलता है कि विटामिन-ई  ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को दूर करने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाता है जोकि अल्जाइमर का एक कारण होता है। विटामिन-ई का मस्तिष्क स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है जिससे याददाश्त में सुधार होता है। इसलिये अल्जाइमर के लक्षणों को कम करने के लिये अपने भोजन में विटामिन-ई  युक्त खाद्य पदार्थों को सम्मलित करें जैसे कि सूरजमुखी के बीज, हरी पत्तेदार सब्जियां कीवी आदि। इसके अतिरिक्त डॉक्टर की सलाह पर 3 से 15 मि।ग्रा तक विटामिन-ई सप्लीमेंट्स लिये जा सकते हैं।  

12. ओमेगा-3 (Omega 3)- एक शोध के अनुसार फैटी एसिड, बीटा-एमीलॉइड (न्यूरॉन में जमने वाला अमीनो एसिड) कम करने और अल्जाइमर रोग के कारण न्यूरॉन्स को होने वाली क्षति को रोकने में सक्षम है। ओमेगा-3 फैटी एसिड मस्तिष्क के कार्यों में सुधार करने तथा इसकी गतिविधियों को बढ़ाने में मदद करता है। अल्जाइमर के लक्षणों  से राहत पाने के लिये ओमेगा -3 फैटी एसिड युक्त खाद्य पदार्थों को अपने भोजन में शामिल करें जैसे कि चिया बीज, सोया, अलसी, अखरोट, मछली आदि।

Conclusion – 

दोस्तो, आज के आर्टिकल में हमने आपको अल्जाइमर के बारे में विस्तार से जानकारी दी। अल्जाइमर क्या है?, डिमेंशिया और अल्जाइमर में अंतर, अल्जाइमर रोग के चरण, अल्जाइमर रोग के कारण, अल्जाइमर के लक्षण, अल्जाइमर रोग की जांच और अल्जाइमर का उपचार, इन सब के बारे में भी विस्तार पूर्वक बताया। देसी हैल्थ क्लब ने इस आर्टिकल के माध्यम से अल्जाइमर के लक्षणों को कम करने और इनसे राहत पाने के बहुत सारे घरेलू उपाय भी बताये। आशा है आपको ये आर्टिकल अवश्य पसन्द आयेगा। 

दोस्तो, इस आर्टिकल से संबंधित यदि आपके मन में कोई शंका है, कोई प्रश्न है तो आर्टिकल के अंत में, Comment box में, comment करके अवश्य बताइये ताकि हम आपकी शंका का समाधान कर सकें और आपके प्रश्न का उत्तर दे सकें। और यह भी बताइये कि यह आर्टिकल आपको कैसा लगा। आप इस पोस्ट को अपने दोस्तों और सगे – सम्बन्धियों के साथ भी शेयर कीजिये ताकि सभी इसका लाभ उठा सकें। दोस्तो, आप अपनी टिप्पणियां (Comments), सुझाव, राय कृपया अवश्य भेजिये ताकि हमारा मनोबल बढ़ सके। और हम आपके लिए ऐसे ही Health-Related Topic लाते रहें। धन्यवाद।

Disclaimer – यह आर्टिकल केवल जानकारी मात्र है। किसी भी प्रकार की हानि के लिये ब्लॉगर/लेखक उत्तरदायी नहीं है। कृपया डॉक्टर/विशेषज्ञ से सलाह ले लें।

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