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हार्ट फेलियर क्या है? – What is Heart Failure in Hindi

हार्ट फेलियर क्या है

स्वागत है आपका हमारे ब्लॉग में। दोस्तो, आपने कार्डियक अरेस्ट और हार्ट अटैक के बारे में तो बहुत सुना होगा और इनके बारे में जानते भी होंगे। परन्तु क्या आप हार्ट फेलियर के बारे में भी जानते हैं। कार्डियक अरेस्ट जानलेवा स्थिति बन सकती है और हार्ट अटैक जानलेवा होता ही है यदि मरीज को तुरंत उपचार ना मिले तो। वहीं हार्ट फेलियर जानलेवा तो नहीं होता मगर हार्ट अटैक को ट्रिगर कर सकता है। हार्ट फेलियर, हृदय की वह स्थिति है जहां किसी भी कारण से हार्ट, रक्त पंप करने की क्षमता खो बैठता है। परिणाम स्वरूप शरीर के सभी अंगों को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन युक्त रक्त नहीं मिल पाता जिससे कई जटिलताएं पैदा होती हैं। आखिर यह हार्ट फेलियर है क्या?। दोस्तो, यही है हमारा आज का टॉपिक “हार्ट फेलियर क्या है?”। 

देसी हैल्थ क्लब इस आर्टिकल के माध्यम से आपको हार्ट फेलियर के बारे में विस्तार से जानकारी देगा और यह भी बताएगा कि इसका उपचार क्या है। तो, सबसे पहले जानते हैं कि हार्ट फेलियर क्या है और इसके कितने प्रकार होते हैं। फिर इसके बाद बाकी बिंदुओं पर जानकारी देंगे।

हार्ट फेलियर क्या है? – What is Heart Failure?

दोस्तो, हृदय, रक्त पंप करके शरीर के प्रत्येक हिस्से को ऑक्सीजन युक्त रक्त सप्लाई करता है। हार्ट फेलियर उस स्थिति को संदर्भित करता है जिसमें हृदय अपनी पूरी कुशलता के साथ रक्त पंप करने की क्षमता को खो देता है। इसका सरल भाषा में सीधा सा अर्थ यह है कि हृदय सही प्रकार से रक्त पंप नहीं कर पाता है। उसके रक्त पंप करने की सामान्य गति कम हो जाती है। हृदय की इस विफलता के कई कारण होते हैं जिनका जिक्र हम आगे करेंगे। 

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हार्ट फेलियर होने से हृदय द्वारा सभी अंगों में रक्त की आपूर्ति की गति में कमी आती है जिससे रक्त नसों और फेफड़ों में इकट्ठा होने लगता है। इसके परिणाम स्वरूप पैरों और टखनों सहित शरीर के विभिन्न अंगों में सूजन आने लगती है। चूंकि यह मामला हृदय का है तो यह स्थिति महिला और पुरुष किसी में भी हो सकती है। बच्चों में यह जन्मजात भी हो सकती है। हमारे देश भारत में हार्ट फेलियर की स्थिति लगभग 1 प्रतिशत या 80-100 लाख व्यक्तियों को होती है।

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हार्ट फेलियर के प्रकार – Types of Heart Failure

हृदय की विफलता या हार्ट फेलियर के प्रकार निम्नलिखित हैं –

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1. लेफ्ट साइड हार्ट फेलियर (Left Side Heart Failure)- यह हार्ट फेलियर का सबसे सामान्य प्रकार है। हृदय का बाईं तरफ का चैंबर अधिक महत्वपूर्ण होता है यह थोड़ा बड़ा भी होता है। हृदय की बाईं वेंट्रिकल, पूरे शरीर के लिए रक्त पंप करके ऑक्सीजन युक्त रक्त प्रदान करने के लिए जिम्मेवार होती है। 

जब हृदय की बाईं वेंट्रिकल किसी कारणवश सही तरीके से रक्त पंप कर पाने में असमर्थ होती है तो शरीर को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन युक्त रक्त नहीं मिल पाता तथा रक्त फेफड़ों में इकट्ठा हो जाता है। इससे सांस लेने में दिक्कत होती है। लेफ्ट साइड हार्ट फेलियर के भी निम्नलिखित दो प्रकार बताए गए हैं –

(i) सिस्टोलिक फेलियर (Systolic Failure)- इस स्थिति में बाईं वेंट्रिकल की असमर्थता की वजह से हृदय, दूसरे अंगों में पूरी ताकत के साथ रक्त पंप करने में अक्षम होता है। अतः हृदय से प्रवाहित होने वाले रक्त में कमी हो जाती है। इसमें हृदय की मासपेशियों में सामान्य रूप से संकुचन नहीं आता है। 

(ii) डायस्टोलिक फेलियर (Diastolic Failure)- इस स्थिति में बाएं वेंट्रिकल की मांसपेशियां अकड़ जाती हैं, ये कठोर और सख्त हो जाती हैं। इस वजह से रक्त पंप ठीक से नहीं हो पाता है। यह स्थिति शरीर के अन्य भागों में रक्त प्रवाह को प्रभावित करती है। हृदय को कम रक्त मिलने से फेफड़ों पर दबाव बढ़ जाता है। पैरों और पेट में द्रव जमा होने लगता है।

2. राइट साइड हार्ट फेलियर (Right Side Heart Failure)- राइट साइड हार्ट फेलियर के लिए लेफ्ट साइड हार्ट फेलियर जिम्मेवार होता है। लेफ्ट साइड हार्ट फेलियर के कारण रक्त फेफड़ों में इकट्ठा हो जाता है तो दाएं चैंबर को अधिक काम करना पड़ता है। अधिक काम के दबाव की वजह से हृदय का दांया भाग अपनी सक्षमता खो देता है। इस स्थिति में नसों में रक्त की मात्रा बढ़ जाती है जिससे शरीर के विभिन्न अंगों में सूजन आ जाती है, 

3. कंजेस्टिव हार्ट फेलियर(Congestive Heart Failure) – जब हृदय पूरी क्षमता से रक्त पंप नहीं कर पाता तो रक्त के प्रवाह की गति कमी आना स्वाभाविक है। ठीक प्रकार से रक्त पंप ना हो पाने और हृदय द्वारा रक्त को पूरी गति से ना प्रवाहित हो पाने से रक्त की मात्रा नसों में बढ़ने लगती है।

परिणाम स्वरूप शरीर के विभिन्न अंगों सहित पैरों और टखनों में सूजन आने लगती है। फेफड़ों में रक्त के इकट्ठा होने से सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। इसी स्थिति को कंजेस्टिव हार्ट फेलियर कहा जाता है।  

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हार्ट फेलियर के कारण – Cause of Heart Failure

हार्ट फेलियर के निम्नलिखित मुख्य कारण होते हैं – 

1. हाई ब्लड प्रेशर (High Blood Pressure)- ब्लड प्रेशर का हाई होना हमेशा ही खतरनाक होता है। ब्लड प्रेशर के बढ़ने से रक्त वाहिकाओं पर दबाव पड़ता है जिसके चलते रक्त की आपूर्ति के लिए हृदय को रक्त पंप करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है। लंबे समय तक यह स्थिति बने रहने से हृदय की मांसपेशियां मोटी हो जाती हैं।

2. हृदय वाल्व का खराब होना (Heart Valve Failure)- यदि हृदय के वॉल्व खराब हो जाएं तो हृदय सामान्य रूप से रक्त पंप नहीं कर पाता है और ना ही वेंट्रिक्ल्स में रक्त  भर पाता है। यह स्थिति हृदय गति में अवरोध पैदा कर सकती है जिससे हार्ट अटैक भी आ सकता है। 

3. जन्म से हृदय वॉल्व खराब होना (Congenital Heart Valve Defect)- यदि जन्म से ही हृदय वॉल्व में ब्लॉकेज है या वॉल्व में सिकुड़न है तो हृदय को सामान्य रूप से रक्त पंप करने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। यह स्थिति भी हार्ट फेलियर का कारण बनती है। 

4. जन्मजात हृदय विकार (Congenital Heart Defect)- हृदय वॉल्व में ब्लॉकेज या वॉल्व में संकुचन के अलावा भी सैकड़ों की संख्या में जन्मजात हृदय विकार होते हैं जैसे कि हृदय में छेद होना, रक्त वाहिकाओं का असामान्य रूप से जुड़े होना, हार्ट चेम्बर का अविकसित होना, ये सब भी हार्ट फेलियर की वजह बनते हैं। 

5. कोरोनरी हृदय रोग (Coronary Heart Disease)- जब कोरोनरी धमनियां क्षतिग्रस्त हो जाएं या ये इनमें सूजन आ जाए या इनमें फैट जम जाए जिसे “प्लाक” कहते हैं जिससे संकुचित हो जाती हैं, तो इन स्थितियों में हृदय को पर्याप्त मात्रा में रक्त नहीं मिलता। क्योंकि इनसे धमनियों में रक्त के प्रवाह में रुकावट आती है। 

हृदय को पर्याप्त मात्रा में रक्त ना मिलने से हृदय को रक्त पंप करने में बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। यह स्थिति हार्ट फेलियर का कारण बनती है। 

6. कार्डियोमायोपैथी (Cardiomyopathy)- जब हृदय के ऊतक अपने आप क्षतिग्रस्त होने लगें तो इस स्थिति को कार्डियोमायोपैथी कहा जाता है। इसमें हृदय की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं। परिणामस्वरूप हृदय को शरीर के अन्य अंगों के लिए रक्त पंप करना बेहद कठिन हो जाता है। यह स्थिति हार्ट फेलियर को जन्म देती है।

7. मायोकार्डिटिस (Myocarditis)- इस स्थिति में वायरल इन्फेक्शन के कारण हृदय की मांसपेशियों में सूजन व लालिमा आ जाती है। यह हृदय के इलेक्ट्रिकल सिस्टम को प्रभावित करता है। इसके परिणामस्वरूप हृदय की धड़कन अनियमित हो जाती है। इससे हृदय कमजोर पड़ने लगता है और रक्त पंप करने की क्षमता कम हो जाती है जिससे रक्त संचार सामान्य रूप से नहीं हो पाता।

8. एरिथिमिया (Arrhythmia)- जब हृदय की लय को समन्वित करने वाले विद्युत आवेग सामान्य रूप से प्रवाहित नहीं होते तब हृदय बहुत तेज या धीमे अनियमित लय के साथ धड़कता है। इसे हृदय की अनियमित धड़कन कहा जाता है। मेडिकल भाषा में इसे एरिथिमिया कहा जाता है। यह स्थिति हृदय को कमजोर बनाती है जिससे हार्ट फेलियर की स्थिति बनती है।

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हार्ट फेलियर के जोखिम कारक – Risk Factors for Heart Failure

निमन्लिखित कारक हार्ट फेलियर के जोखिम को बढ़ाने में मदद करते हैं –

  1. आयु – 65 वर्ष से अधिक आयु, हार्ट फेलियर के जोखिम को बढ़ाती है।
  2. पारिवारिक इतिहास – यदि परिवार के किसी सदस्य को हार्ट फेलियर की समस्या है तो परिवार के अन्य सदस्य को भी यह समस्या होने की संभावना रहती है।
  3. डायबिटीज 
  4. लिवर से जुड़ी समस्या 
  5. किडनी की समस्या 
  6. थायरॉइड की समस्या
  7. एचआईवी
  8. शरीर में प्रोटीन का जमा होना
  9. अधिक वजन (मोटापा)
  10. धूम्रपान
  11. शराब का अधिक सेवन
  12. ड्रग्स व नशीले पदार्थ
  13. एनाबॉलिक स्टेरॉयड या कैंसर की दवाएं
  14. पल्मोनरी हाइपरटेंशन-  एक प्रकार का उच्च रक्तचाप है। यह फेफड़ों में धमनियों को तथा हृदय की दायीं साइड को प्रभावित करता है। 

हार्ट फेलियर के लक्षण – Symptoms of Heart Failure

हार्ट फेलियर के निम्नलिखि लक्षण प्रकट होते हैं –

  1. लगातार खांसी 
  2. सांस लेने में परेशानी
  3. पेट में सूजन
  4. भूख में कमी होना
  5. अचानक से वजन बढ़ना
  6. हृदय की अनियमित धड़कन
  7. गर्दन की नसों में उभार
  8. पैरों और टखनों सूजन में सूजन
  9. बार-बार पेशाब आना
  10. थकान व कमजोरी महसूस करना

कार्डियक अरेस्ट, हार्ट अटैक और हार्ट फेलियर में अंतर – Difference Between Cardiac Arrest, Heart Attack and Heart Failure

दोस्तो, तीनों की समस्या अलग-अलग है, यह निम्नलिखित विवरण से स्पष्ट हो जाता है – 

1. कार्डियक अरेस्ट (Cardiac Arrest)- यह विद्युत प्रणाली की समस्या है जिसमें हृदय को सही तरीके से रक्त को पंप करने के लिए हृदय के नीचे के दोनों चेंबर्स को इलेक्ट्रिकल सिगनल नहीं मिल पाते। इस वजह से हृदय अचानक से ब्लड पंप करना बंद कर देता है। परिणामस्वरूप शरीर की कोशिकाओं को और अंगों को जरूरी ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और तभी कार्डियक अरेस्ट क्या होता है। 

कार्डियक अरेस्ट होने पर सांस लेने में दिक्कत, छाती में दर्द होना, मितली, उल्टी, चक्कर आना, हृदय गति का धीमा हो जाना जैसे लक्षण प्रकट होते हैं। यह स्थिति जानलेवा हो सकती है और हार्ट अटैक आने का पूर्व संकेत। यदि व्यक्ति को तुरन्त कार्डियो पल्मोनरी रिससिटैशन (CPR) मिल जाए तो उसकी जान बच सकती है। 

2. हार्ट अटैक (Heart Attack)- हार्ट अटैक रक्त संचार की समस्या है जो कोरोनरी आर्टरी में ब्लॉकेज आने के कारण उत्पन्न होती है। कोरोनरी आर्टरी के क्षतिग्रस्त होने, इनमें प्लाक जमने, सिकुड़ने या ब्लड क्लॉटिंग आदि की वजह से कोरोनरी आर्टरी में रक्त का प्रवाह रुक जाता है जिससे हृदय को रक्त पंप करने के लिए रक्त नहीं मिल पाता। 

ऐसा होने पर छाती में दबाव महसूस होता है, छाती में अचानक तेज दर्द उठता है, सांस लेने में दिक्कत होने लगती है, बहुत ज्यादा पसीना आता है और हृदय की गति असामान्य हो जाती है। यह जानलेवा स्थिति होती है। व्यक्ति की जान बचाने के लिए उसे नजदीक के अस्पताल में भर्ती कराना होता है।

3. हार्ट फेलियर (Heart Failure)- हार्ट फेलियर, हृदय द्वारा रक्त पंप ना कर पाने की समस्या है। इसे हृदय विफलता कहा जाता है जिसमें हृदय सुचारु रूप से सामान्य गति से रक्त पंप करने में असमर्थ होता है। हाई ब्लड प्रेशर, कोरोनरी हृदय रोग, हृदय के वॉल्व खराब होना, चिकित्सकीय स्थितियां, जन्मजात हृदय विकार आदि इसके लिए जिम्मेदार होते हैं 

सांस लेने में दिक्कत, असामान्य हृदय गति, लगातार खांसी, पेट में सूजन, भूख में कमी, वजन में कमी, पैरों और टखनों सूजन में सूजन आदि इसके लक्षण होते हैं। यह जानलेवा बीमारी तो नहीं है परन्तु कभी ना कभी हार्ट अटैक को आमंत्रित कर सकती है।

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हार्ट फेलियर का निदान – Diagnosis of Heart Failure

हार्ट फेलियर की जांच के लिए पहले शारीरिक परीक्षण किया जाता है। लक्षण जानने के पश्चात इसके कारण जानना भी जरूरी होता है। यह जानना जरूरी होता है कि शरीर का टोटल कोलेस्ट्रॉल लेवल क्या है, इलेक्ट्रोलाइट्स का लेवल क्या है, किडनी ठीक से काम कर रही है या नहीं, हृदय के वॉल्व ठीक हैं या नहीं, इन सब का पता लगाने के लिये डॉक्टर निम्नलिखित टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं –

  1. ब्लड टेस्ट
  2. इकोकार्डियोग्राम
  3. कार्डियक कंप्यूटराइज्ड टोमोग्राफी (सीटी स्कैन)
  4. मेग्नेटिक रिसोएंस इमेजिंग (MRI)
  5. कोरोनरी एंजियोग्राफी
  6. मस्तिष्क नैट्रियूरेटिक पेप्टाइड टेस्ट
  7. माइओकार्डियल बायोप्सी

हार्ट फेलियर का उपचार –  Treatment of Heart Failure 

दोस्तो, हार्ट फेलियर के लक्षणों को जानकर, इसके कारण को समझ कर इसका इलाज किया जाता है। अर्थात् यदि हृदय की धड़कन, हृदय की मांसपेशियों के संकुचन की समस्या है दवाओं के जरिये इनका उपचार हो जाता है। यदि हृदय के वाल्व की समस्या है तो इनकी मरम्मत कर दी जाती है, मरम्मत लायक वाल्व नहीं है तो वाल्व बदल दिये जाते हैं। हार्ट फेलियर के उपचार की विधि का विवरण निम्न प्रकार है :-

1. दवाएं – Medicines

(i) एस इन्हिबिटर्स (ACE Inhibitors) – इन दवाओं का उपयोग सिस्टोलिक हार्ट फेलियर के मरीजों के लिए किया जाता है।

(ii) एल्डोस्टेरोन एंटागोनिस्ट्स (Aldosterone Antagonists) जैसे अलडाकटोन (Aldactone) भी सिस्टोलिक हार्ट फेलियर (Systolic Heart Failure) के मरीजों के लिए दी जा सकती है। परन्तु इन दवाओं से पोटैशियम के स्तर में बहुत वृद्धि हो सकती है।

(iii) एनजिओटेनसिन II रिसेप्टर ब्लॉकर्स (Angiotensin II receptor blockers) – जो मरीज इन्हिबिटर्स (ACE Inhibitors) का उपयोग नहीं कर सकते उनको डिओवान (Diovan) जैसी दवाएं दी जाती हैं। 

(iv) बीटा ब्लॉकर्स (Beta Blockers) – इस वर्ग में मेटोप्रोलोल (Metoprolol) तथा बैसोप्रोलोल (Bisoprolol) हृदय के लक्षणों में सुधार लाने के लिए दी जाती हैं।

(v) ड्यूरेटिक (Diuretics) जैसे कि लेसिक्स (Lasix) का उपयोग फेफड़ों में द्रव होता है कम करने के लिए दी जाती हैं ताकि मरीज को आसानी सांस आ सके। यद्यपि ये दवाएं शरीर में पोटैशियम और मैग्नीशियम के स्तर को कम कर देती हैं इसलिए डॉक्टर मरीज को पोटैशियम और मैग्नीशियम युक्त दवाएं दे सकते हैं।

(vi) इनोटरोप्स (Inotropes) हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट पंप करने से जुड़ी समस्या के लिये, हृदय की लय से जुड़ी समस्याओं जैसे अटरियल फिब्रिलेशन (Atrial Fibrillation) के उपचार में लनोक्सिन (Lanoxin) दी जा सकती है।  

2. चिकित्सक उपकरण (Medical Equipment)- उपचार की इस विधि में निम्नलिखित उपकरणों का उपयोग किया जा सकता है –

(i) वॉल्व (Valve)- यदि हृदय के वॉल्व खराब हो गए हैं तो इनको बिना ओपन हार्ट सर्जरी के, मिनिमली इनवेसिव सर्जरी (Minimally Invasive Surgery) और कार्डियक केथेटराइज़शन (Cardiac Catheterization) का उपयोग करते हुए वॉल्व की मरम्मत की जाती है। यदि वॉल्व मरम्मत के लायक नहीं है तो इसको नये वॉल्व से बदल दिया जाता है।

(ii) इम्प्लांटेबल कार्डिओवर्टर-डेफिब्रिलेटर्स (आईसीडी) (Implantable Cardioverter-Defibrillators (ICDs) – यदि हृदय की लय (rhythm) से जुड़ी कोई समस्या है तो इसे कंट्रोल करने के लिए आईसीडी नामक एक उपकरण लगा दिया जाता है। यह उपकरण, पेसमेकर के समान ही है।

(iii) कार्डियक रीसिंक्रोनाइज़ेशन थेरेपी (सीआरटी) (Cardiac resynchronization therapy (CRT)) या बाइवेन्ट्रिक्युलर पासिंग (Biventricular Pacing) – 

बाइवेन्ट्रिक्युलर हृदय को सही तरीके से रक्त को पंप करने के लिए हृदय के नीचे के दोनों चेंबर्स को इलेक्ट्रिकल सिगनल देता है। हृदय के इस इलेक्ट्रिकल सिस्टम में समस्या होने पर हृदय की पहले से ही कमजोर पड़ चुकी मांसपेशियां समन्वित तरीके से काम नहीं कर पाती हैं। ऐसी समस्या अक्सर अधिकतर लोगों में होती है।  हार्ट फेलियर के मरीजों में बाइवेन्ट्रिक्युलर पेसमेकर का उपयोग अधिकतर आईसीडी (ICD) के साथ किया जाता है।

(iv) वेंट्रिकुलर असिस्ट डिवाइस (वीएडी) (Ventricular Assist Devices (VAD) – वेंट्रिकुलर असिस्ट डिवाइस एक इलेक्ट्रोमैकेनिकल डिवाइस है जोकि कमजोर हृदय को रक्त पंप करने में मदद करता है। इसे पेट या छाती में लगाया कर हृदय से जोड़ दिया जाता है। इसे हृदय प्रत्यारोपण के विकल्प स्वरूप उपयोग में लाया जाता है। 

3. सर्जरी (Surgery)- हृदय को रक्त की आपूर्ति करने वाली यदि कोई कोरोनरी आर्टरीज किसी कारणवश बाधित हो गई है तो इसके लिये सर्जरी के जरिए बाईपास चैनल बनाया जाता है। इसमें छाती, बांह या पैर से एक रक्त वाहिका लेकर बाधित कोरोनरी आर्टरीज के साथ जोड़ दिया जाता है ताकि हृदय को रक्त की आपूर्ति सुचारु रूप से होती रहे। इसे हृदय के लिए ग्राफ्टिंग भी कहा जाता है।

4. हृदय प्रत्यारोपण (Heart Transplant)- जब दवाइयाँ और सर्जरी के बालजूद भी हार्ट फेलियर की समस्या बनी रहती है तो हृदय प्रत्यारोपण (Heart Transplantation) ही एकमात्र विकल्प रह जाता है। इसके लिये दान में मिले हृदय की आवश्यकता होती है जिसके लिए काफी लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती है। दान में हृदय मिल जाने पर सर्जरी के द्वारा हृदय प्रत्यारोपण किया जाता है।

Conclusion – 

दोस्तो, आज के आर्टिकल में हमने आपको हार्ट फेलियर के बारे में विस्तार से जानकारी दी। हार्ट फेलियर क्या है, हार्ट फेलियर के प्रकार, हार्ट फेलियर के कारण, हार्ट फेलियर के जोखिम कारक, हार्ट फेलियर के लक्षण, कार्डियक अरेस्ट, हार्ट अटैक और हार्ट फेलियर में अंतर और हार्ट फेलियर का निदान, इन सब के बारे में भी विस्तार पूर्वक बताया। देसी हैल्थ क्लब ने इस आर्टिकल के माध्यम से हार्ट फेलियर के उपचार भी बताए। आशा है आपको ये आर्टिकल अवश्य पसन्द आयेगा।

दोस्तो, इस आर्टिकल से संबंधित यदि आपके मन में कोई शंका है, कोई प्रश्न है तो आर्टिकल के अंत में, Comment box में, comment करके अवश्य बताइये ताकि हम आपकी शंका का समाधान कर सकें और आपके प्रश्न का उत्तर दे सकें। और यह भी बताइये कि यह आर्टिकल आपको कैसा लगा। आप इस पोस्ट को अपने दोस्तों और सगे – सम्बन्धियों के साथ भी शेयर कीजिये ताकि सभी इसका लाभ उठा सकें। दोस्तो, आप अपनी टिप्पणियां (Comments), सुझाव, राय कृपया अवश्य भेजिये ताकि हमारा मनोबल बढ़ सके। और हम आपके लिए ऐसे ही Health-Related Topic लाते रहें। धन्यवाद।

Disclaimer – यह आर्टिकल केवल जानकारी मात्र है। किसी भी प्रकार की हानि के लिये ब्लॉगर/लेखक उत्तरदायी नहीं है। कृपया डॉक्टर/विशेषज्ञ से सलाह ले लें।

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दोस्तो, आज के आर्टिकल में हमने आपको हार्ट फेलियर के बारे में विस्तार से जानकारी दी। हार्ट फेलियर क्या है, हार्ट फेलियर के प्रकार, हार्ट फेलियर के कारण, हार्ट फेलियर के जोखिम कारक, हार्ट फेलियर के लक्षण, कार्डियक अरेस्ट, हार्ट अटैक और हार्ट फेलियर में अंतर और हार्ट फेलियर का निदान, इन सब के बारे में भी विस्तार पूर्वक बताया।
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