दोस्तो, स्वागत है आपका हमारे ब्लॉग पर। आपने देखा होगा कि कुछ लोगों की कमर पर बहुत चौड़ी पट्टी बंधी रहती है। कई लोग कमर पर हाथ का सहारा देकर चलते हैं, ज्यादा चला नहीं जाता, तो कई अक्सर लेटे ही रहते हैं। आखिर इनकी समस्या क्या है? फिर पूछने पर पता चलता है कि इनको कमर दर्द की शिकायत रहती है। बहुत दवाईयां खाने के बावजूद भी आराम नहीं आ रहा। फिर टैस्ट करवाने पर पता चलता है कि कमर दर्द की समस्या वास्तव में स्लिप डिस्क की समस्या है और इसके उपचार के अनेक विकल्प होते हैं। इन्हीं में एक विकल्प ऐसा भी है जिसमें ना तो कोई डॉक्टर की दवा खानी पड़ती है और ना कोई थेरेपी या सर्जरी। जी हां, हम बात कर रहे हैं योगा की। कई योगासन ऐसे होते हैं जिनके करने से स्लिप डिस्क की समस्या दूर हो जाती है। दोस्तो, यही है हमारा आज का टॉपिक “स्लिप डिस्क के लिये योगासन”। देसी हैल्थ क्लब इस लेख के माध्यम से आज आपको स्लिप डिस्क के बारे में विस्तार से जानकारी देगा और यह भी बतायेगा कि योगासन से कैसे इस स्लिप डिस्क से राहत पाई जाये। दोस्तो, स्लिप डिस्क को जानने से पहले रीढ़ की हड्डी के बारे में जानना जरूरी है। तो सबसे पहले जानते हैं कि रीढ़ की हड्डी क्या है, डिस्क क्या होती है और स्लिप डिस्क किसे कहते हैं।  इसके बाद फिर अन्य बिन्दुओं (Points) की जानकारी देंगे। 

स्लिप डिस्क के लिए योगासन

रीढ़ की हड्डी क्या है? – What is the Spinal Cord?

दोस्तो, गर्दन और धड़ के पीछे वाले मध्य भाग में, एक लंबी, घुमावदार, श्रंखलाबद्ध हड्डियां (कशेरुकाएं) जो डिस्क से जुड़ी होती हैं, रीढ़ की हड्डी कहलाती है। ये बच्चे में 33 हड्डियां होती हैं बाद में अर्थात् किशोरावस्था के पश्चात् कुछ हड्डियां एक में जुड़ जाती हैं। इस प्रकार व्यस्क व्यक्ति में कुल 26 हड्डियां होती हैं। इन रीढ़ की हड्डियों के नाम और इनकी संख्या निम्न प्रकार  हैं :-

1. ग्रीवा कशेरुक (Cervical vertebrae) = 7

2. थोरैसिक कशेरुक (Thoracic vertebrae) = 12

3. काठ का कशेरुक (Lumbar vertebrae) = 5

4. त्रिक कशेरुक (Sacral vertebrae) = 1 (बच्चे में 5, जो बाद में एक में जुड़ जाती हैं)।

5. कोकसील कशेरुक (Coccygeal vertebrae) = 1 (बच्चे में 4, जो बाद में एक में जुड़ जाती हैं)।

डिस्क क्या होती है? – What is a Disc?

जैसा कि हमने बताया कि रीढ़ की हड्डियां डिस्क से जुड़ी होती हैं। साधारण भाषा में कहें तो समझिये कि रबड़ की तरह गोल पट्टियां, जो हड्डियों को जोड़ने के साथ-साथ लचीलापन भी देती हैं, डिस्क कहलाती हैं। ये एक प्रकार से ऐसे पैड होते हैं, जो हड्डियों को झटकों या दबाव से सुरक्षित रखते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे शॉक अब्ज़र्वर मोटरसाईकल को झटकों से बचाते हैं। तो, डिस्क को रीढ़ की हड्डियों “शॉक अब्ज़र्वर” (Shock absorber) कहा जा सकता है। प्रत्येक डिस्क के दो भाग हिस्से होते हैं – एक जैल की तरह आंतरिक हिस्सा और दूसरा बाहर वाला कठोर रिंग। 

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स्लिप डिस्क किसे कहते हैं ? – What is a Slip Disc Called?

दोस्तो, शब्दों से तो यह पता चलता है कि डिस्क अपनी जगह से फिसल (Slip) हो जाती है, या आगे बढ़ जाती है या फूल जाती है या इसकी बाह्य दीवार घिस या छिल जाती है। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है। वास्तव में जब बाहरी रिंग कमजोर हो जाता है तब आतंरिक भाग को बाहर निकलने का रास्ता मिल जाता है। इसी लिये चोट लगने पर या कमजोरी की वजह से डिस्क का आतंरिक भाग, बाहरी रिंग से बाहर निकल जाता है या निकल सकता है,  इसी को स्लिप डिस्क या हर्निएटेड डिस्क या प्रोलेप्स्ड डिस्क या रप्चर्ड डिस्क कहा जाता है। इसमें असहनीय दर्द और बेचैनी होती है। यदि स्लिप डिस्क की वजह से कोई स्पाइनल नस दब गयी तो यह गंभीर स्थिति हो सकती है। इसमें शरीर के किसी विशेष हिस्से में सुन्नपन  हो सकती है। ऐसे गंभीर मामलों में सर्जरी की के द्वारा उपचार किया जाता है। 

स्लिप डिस्क के प्रकार –  Type of Slip Disc

स्लिप डिस्क के निम्नलिखित मुख्य तीन प्रकार होते हैं –

1. सर्वाइकल स्लिप डिस्क (Cervical Slip Disc)- यह समस्या गर्दन में होती है,  जिसमें सिर के पिछले भाग, गर्दन, कंधे की हड्डी, बांह में  और हाथ में दर्द रहता है।

2. थोरेसिक स्लिप डिस्क (Thoracic Slip Disc)- इस प्रकार का स्लिप डिस्क रीढ़ की हड्डी के मध्य भाग में होता है। इस समस्या के कारण दर्द मुख्य रूप से पीठ के बीच में और कंधे में होता है। कभी-कभी यह दर्द शरीर के अन्य भागों जैसे गर्दन, हाथ, उंगलियों, पैर, कूल्हे और पैर की पंजों में भी होता है। 

3. लबंर स्लिप डिस्क (Lumbar Slip Disc)- यह, रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में, स्लिप डिस्क की समस्या है। इसमें पीठ के निचले हिस्से में, कूल्हे, जांघ, जननांग क्षेत्रों, पैर और पैर की उंगलियों में दर्द होता है। 

स्लिप डिस्क के कारण – Cause of Slip Disc

स्लिप डिस्क के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –

1. कमर की हड्डियों में या रीढ़ की हड्डियों में जन्म से ही विकार या सक्रंमण होना। 

2. जन्म से ही पैरों में किसी भी प्रकार की खराबी या बाद में कोई विकार होना।

3. जॉइंट्स डिजेनरेशन के कारण। आमतौर पर बढ़ती उम्र में चलने, फिरने में हड्डियां आपस में टकराती हैं। घुटने मोड़ने में भी तकलीफ होती है। झुकने, सीधे रहने में भी दिक्कत होती है।  

4. स्लिप डिस्क पर अचानक से झटका या चोट लग जाना। रीढ़ की हड्डी में चोट लगना। 

5. स्लिप डिस्क पर किसी चीज से धक्का लगने पर असामन्य दबाव पड़ना जिसके कारण डिस्क में सूजन आ जाती है।

6. उम्र बढ़ने के साथ-साथ हड्डियों का कमजोर हो जाना सामान्य है क्योंकि, इस उम्र में कैल्शियम की अधिक जरूरत होती है लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर कैल्शियम की कमी हो जाती है जिससे डिस्क भी कमजोर होती जाती है और हल्के से झटका लगने पर स्लिप डिस्क होने का खतरा बना रहता है।

अन्य कारण – Others Reason

1. खराब पॉस्चर में बैठना, लेटना, झुकना, झुक कर पढ़ना।

2. गलत पॉस्चर में बहुत देर तक काम करते रहना, विशेष तौर पर कंप्यूटर के पास बैठ कर काम करना। अधिकतर ऐसे मामले में गर्दन कंप्यूटर स्क्रीन पर झुकी रहती है, बाजू चौड़ी की हुई होती हैं। कंप्यूटर के सामने बैठने पर कमर एकदम सीधी होनी चाहिये। इसीलिये कंप्यूटर चेयर स्पेशल बनाई जाती हैं ताकि बैठने पर पॉस्चर सही रहे।  

3. अनियमित दिनचर्या यानी गलत शारीरिक गतिविधियां  जैसे कि बैठे-बैठे एकदम से उठना, झटके के साथ बैठना, खड़े होना, अचानक झुकना, झटके से वजन उठाना आदि स्लिप डिस्क का कारण बनते हैं।

4. आराम दायक जीवनशैली। शरीरिक गतिविधियां ना होना या नहीं के समान होना अर्थात् ना व्यायाम करना, ना पैदल चलना, एक ही जगह पड़े रहना, लेटे रहना आदि। इन सबके प्रभाव से मांसपेशियां कमजोर पड़ जाती हैं। जिससे रीढ़ की हड्डी पर असर पड़ता है और स्लिप डिस्क की संभावना बनी रहती है। 

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5. बहुत देर तक ड्राईविंग करने से भी डिस्क में दर्द, सूजन की समस्या बनती है। इसी लिये लॉंग ड्राइव पर जाते हुऐ बीच-बीच में ब्रेक लेना पड़ता है। रोजाना ऑफिस जाने वालों की रीढ़ की हड्डी में अक्सर दर्द की शिकायत रहती है। जो निरन्तर ड्राईविंग का ही काम करते हैं उनके लिये स्लिप डिस्क की संभावना ज्यादा रहती है। 

6.  बहुत ज्यादा शरीरिक मेहनत करने से विशेषकर मजदूर लोगों को स्लिप डिस्क की संभावना अधिक रहती है। उनके गिरने, फिसलने, दुर्घटना में चोट लगने का खतरा ज्यादा रहता है। 

7. पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में स्लिप डिस्क की संभावना ज्यादा रहती है क्योंकि उनको घर के काम में बार-बार झुकना, उठना, बैठना, वजन उठाना पड़ता है।

स्लिप डिस्क के लक्षण – Symptoms of Slip Disc

स्लिप डिस्क के मामलों में सामान्यतः निम्नलिखित लक्षण देखे जा सकते हैं। 

1. मांसपेशियो की कमजोरी 

2. दर्द की जगह पर जलन और झनझनाहट महसूस होना। 

3. रीढ़ के निचले हिस्से में असहनीय दर्द होना।

4. नसों पर दबाव के पड़ने के कारण कमर में, पैरों में, पैरों की ऐड़ियों में दर्द और पैरों की उंगलियों में सुन्न महसूस करना। 

5. पैर के अंगूठे या पंजों में कमजोरी।

6. चलने, फिरने में दिक्कत होना। ज्यादा चल न पाना।

7. खड़े होने, झुकने, सामान्य काम करने में भी दर्द महसूस होना। 

8. कभी-कभी शरीर के एक हिस्से में ज्यादा दर्द महसूस होना।

9. एक ही पॉस्चर में बैठने, उठने, लेटने में दर्द महसूस होना। 

10. खांसने पर भी शरीर में करंट सा महसूस होना।

11. रीढ़ की हड्डी के बीच में दबाव पड़ने से कई बार हिप या जांघों के आसपास सुन्न महसूस करना। 

12. बहुत अधिक समस्या होने पर मल-मूत्र त्यागने में दिक्कत होना। 

स्लिप डिस्क के चरण – Stages of Slip Disc

स्लिप डिस्क की समस्या के निम्नलिखित चार चरण होते हैं –

1. पहला चरण (First Stage)- इस अवस्था में, बढ़ती हुई उम्र के कारण डिस्क में निर्जलीकरण (Dehydration) की समस्या हो जाने से लचीलापन आ जाता है जिसे यह कमजोर पड़ जाती है। 

2. दूसरा चरण (Second Stage)- दूसरी अवस्था में बढ़ती उम्र के कारण ही डिस्क की रेशेदार परतों में दरारें आना शुरु हो जाती हैं। इस वजह से डिस्क के अंदर का तरल पदार्थ बाहर आने लगता है। 

3. तीसरा चरण (Third Stage)- इस अवस्था में केन्द्रक (nucleus) का एक भाग टूट सकता है। केन्द्रक कोशिका द्रव्य में स्थित वह संरचना है जो जीवद्रव्य की गतिविधियों को कन्ट्रोल करता है।  

4. चौथा चरण (Fourth Stage)- इस अंतिम चरण में, डिस्क के अंदर का द्रव, जिसे न्यूक्लिअस पल्पोसस कहा जाता है, डिस्क से बाहर आने लगता है और रीढ़ की हड्डी में श्राव होने लगता है। 

स्लिप डिस्क का परीक्षण – Test of Slip Disc

स्लिप डिस्क की जांच निम्न प्रकार की जाती है –

1. फिजिकल टेस्ट (Physical Test)- डॉक्टर आपको छूकर शारीरिक परीक्षण करते हैं और आपकी शारीरिक गतिविधियों  जैसे चलना-फिरना, दौड़ना आदि, के दौरान आपकी शारीरिक स्थिति का आकलन  (Assessment) करते हैं।

2. एक्स-रे(X-Ray)- एक्स-रे की मदद से यह जाना जाता है की दर्द की वजह कोई चोट तो नहीं है। 

3. सीटी स्कैन (CT Scan)- इसके माध्यम से यह देखा जाता है कि डिस्क में कोई चोट लगी है या नहीं। यदि चोट लगी है तो उसके आकार और दिशा में क्या बदलाव आया है।  

4. एमआरआई टैस्ट (MRI Test)- इस टैस्ट के जरिये यह जांच की जाती है कि डिस्क में आया बदलाव तंत्रिका-तंत्र को किस प्रकार से प्रभावित कर रहा है।

5. मायलोग्राम (Myelogram) – इस टैस्ट के लिये रीढ़ की हड्डी में एक डाई इंजेक्ट किया जाता है जो द्रव रूप में होता है। फिर रीढ़ की हड्डी का एक्स-रे करते हैं। इससे यह पता चल जाता है कि रीढ़ की हड्डी या नसों पर किस प्रकार का दबाव पड़ रहा है।

चिकित्सा के विकल्प – Medical Options

दोस्तो, स्लिप डिस्क का उपचार कई पद्धतियों द्वारा किया जाता है। यदि इस बारे में लापरवाही न की जाये और समय रहते इसका इलाज शुरु कर दिया जाये तो, 90 प्रतिशत मामलों में सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती। तो जानते हैं कि किन-किन चिकित्सा पद्धतियों द्वारा इसका उपचार किया जाता है। 

1. फिजियोथेरेपी (Physiotherapy)- आमतौर पर फिजियोथेरेपी के द्वारा स्लिप डिस्क की सामान्य समस्याओं का उपचार किया जाता है अर्थात् मरीज में स्लिप डिस्क की गंभीर स्थिति नहीं होती। फिजियोथेरेपी एक्सपर्ट फिजियोथेरेपिस्ट द्वारा  की जाती है। उनके द्वारा कराये गये व्यायाम या उनकी निगरानी में, दवाई लगा कर मशीनों द्वारा की गई मसाज, से कमर और आसपास की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। व्यायाम कराने के 10 मिनट पहले, दर्द कम करने के लिये हॉट पैक का भी उपयोग किया जाता है। इस थेरेपी से ज्यादातर मामलों में आराम लग जाता है।

2. दवाईयां (Medicines)- डॉक्टर, मरीज की स्थिति को ध्यान में रखते हुऐ, मसल्स रिलेक्सर्स और नैक्रोटिक्स दवाएं लेने की सलाह देते हैं ताकि मांसपेशियों का खिंचाव और दर्द खत्म हो।

3. ओपन सर्जरी (Open Surgery)- लगातार छः सप्ताह तक, यदि मरीज को व्यायाम करने और दवाईयां खाने से भी, आराम नहीं आता है तो डॉक्टर, जांच के बाद सर्जरी करते हैं। सर्जरी के द्वारा डिस्क के खराब हिस्से को निकाल दिया जाता है जिसे माइक्रोडिस्केक्टॉमी कहा जाता है। इसमें पूरी डिस्क निकालने की जरूरत नहीं पड़ती। गंभीर मामलों में यदि, डिस्क निकालने की जरुरत हो तो डिस्क बदल दी जाती है। 

4. मिनिमली इनवेसिव सर्जरी (Minimally Invasive Surgery)- ओपन नेक और बैक सर्जरी की तुलना में मिनिमली इनवेसिव डिकम्प्रेशन और मिनिमली इनवेसिव स्टेबिलाइजेशन प्रक्रियाऐं बहुत सुरक्षित और प्रभावशाली विकल्प हैं। इन प्रक्रियाओं में छोटा चीरा लगाकर सर्जरी कर दी जाती है।

5. ओजोन (ऑक्सीजन का परिष्कृत रूप) थेरेपी (Ozone Therapy)- इस चिकित्सा पद्धति को ओजोन्युक्लियोलाइसिस (Ozonucleolysis) के नाम से भी जाना जाता है। यह एक नई चिकित्सा पद्धति है।  इसमें कोई चीरा नहीं लगाया जाता। इस पद्धति से उपचार उन मामलों में किया  जाता है जिन मरीजों की तंत्रिकाओं का निचला हिस्सा दब गया हो, जिससे पैरों में बहुत तेज दर्द होता है। इस प्रक्रिया में प्रभावित डिस्क में ओजोन (ऑक्सीजन का परिष्कृत रूप) का इंजेक्शन लगा दिया जाता है, जिससे  दर्द में तुरंत आराम आ जाता है। लेकिन पैरों के लकवा ग्रस्त मामले में सर्जरी की ही जरूरत होती है।

स्लिप डिस्क के लिये योगासन – Yoga For Slip Disc 

दोस्तो, अब आपको बताते हैं कुछ निम्नलिखित  योगासन जिनकी मदद से स्लिप डिस्क की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। इनको योग गुरू की देखरेख में करना चाहिये और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही करें। 

1. उष्ट्रासन (Ustrasana)- यह रीढ़ की हड्डी की समस्या से राहत पाने लिये बहुत लाभकारी योगासन है। इसमें शरीर की ऊंट की मुद्रा बन जाती है। 

उष्ट्रासन करने का तरीका – How to do Ustrasana

(i)  जमीन पर मैट बिछा कर घुटनों के बल बैठ जायें। जांघें और पैर एक साथ रहें, पंजे पीछे की ओर फर्श  

(ii) घुटनों और पैरों के बीच एक फुट की दूरी बनायें और अपने घुटनों पर खड़े हो जायें।

(iii) अब सांस लेते हुए पीछे की ओर झुकें, ध्‍यान रखें कि पीछे झुकते हुऐ गर्दन में झटका न लगे। पीछे की ओर झुकते हुऐ हाथों को पैरों की ऐड़ी पर रखें।

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(iv) सिर पीछे की ओर झुका रहे, जांघें फर्श से समकोण बनाती हुई रहें। गर्दन पर बिना दबाव डाले बैठे रहें। सांस धीरे-धीरे लेते रहें और छोड़ते रहें। शरीर का भार बांहों और पैरों पर समान रूप में रहे। 

(v)  इस मुद्रा में जितना हो सके उतनी देर रहें, फिर वापिस अपनी सामान्य अवस्था में आ जायें। इस आसन के पांच चक्र कीजिये। 

2. भुजंगासन (Bhujangasana)- यह योगासन सूर्य नमस्कार के 12 आसनों में 7वां आसन है। इसमें शरीर फन उठाये सांप की आकृति बनाता है। इससे रीढ़ की ऊपरी हड्डियों पर दबाव पड़ने से हड्डियां पुरानी स्थिति में आ जाती हैं, शरीर लचीला बनता है और कमर का दर्द भी खत्म हो जाता है। 

भुजंगासन करने का तरीका – How to do Bhujangasana

(i)  जमीन पर मैट बिछाकर पेट के बल लेट जायें। दोनों पैरों को पीछे की ओर सीधे रहें, इनके बीच में गैप नहीं होना चाहिये। 

(ii) अब दोनों हाथ की हथेलियों को कंधों के नीचे जमीन पर टिका कर शरीर के अगले भाग यानी छाती, पेट तक को ऊपर  उठायें। सांस धीरे-धीरे लेते, छोड़ते रहें। 

(iii) ध्यान रहे कि कमर पर खिंचाव ज्यादा ना पड़े। इसी अवस्था में 10-20 सैकेन्ड के लिये, रहें फिर सामान्य अवस्था में आ जायें।

(iv) शुरुआत में दो-तीन चक्र करें। बाद में इस योगासन की संख्या बढ़ा सकते हैं। 

3. शलभासन (Shalabhasana)- इस योगासन में शरीर की टिड्डे जैसी आकृति बनाती है। इस योगासन से स्लिप डिस्क और कमर दर्द से राहत मिलती है। 

शलभासन करने का तरीका – How to do Shalabhasana

(i)  मैट बिछाकर पेट के बल लेट जायें और हथेलियों को जांघों के नीचे दबाकर रखें।

(ii) अपने दोनों पैरो को सीधा रखें, पंजे ऊपर की ओर सीधे रहें और एड़ियां आपस में मिली हुई हों।

(iii) अब, सांस लेते हुए अपने दोनों पैरों को जितना हो सके ऊपर उठायें।  धीरे-धीरे सांस लेते रहें, छोड़ते रहें। जितनी देर हो सके, इसी मुद्रा में रहें, फिर वापिस अपनी सामान्य अवस्था में आ जायें।

(iv) इस योगासन के तीन से पांच चक्र करें। 

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4. मकरासन (Makarasana)- मकरासन को कमर दर्द और स्लिप डिस्क के उपचार में एक उत्तम योगासन माना जाता है। यह शरीर, मन और तंत्रिका-तंत्र के लिये लाभदायक है। इसमें शरीर की मुद्रा मगरमच्छ के समान बनती है।

मकरासन करने का तरीका – How to do Makarasana

(i)  सबसे पहले जमीन पर मैट बिछाकर उल्टा यानी पेट के बाल लेट जायें। पैर जुड़े हुए पीछे की और सीधे रखें। 

(ii) अब सिर और कंधों को उठायें, गर्दन सीधी रहे, नजर सामने रखें। 

(iii) अपनी कोहनियों को जमीन पर अपने हिसाब से टिकायें यानी कोहनियां ज्यादा आगे होने से गर्दन पर ज्यादा दबाव पड़ेगा, शरीर के पास होने पर पीठ पर अधिक दबाव पड़ेगा। अब ठोड़ी को हथेलियों पर लगायें। 

(iv) अब अपने दाहिने पैर को मोड़ कर कूल्हों तक ले जाये और वापिस लायें, फिर बांये पैर को मोड़कर कूल्हों तक ले जाये और वापिस लायें। इस प्रक्रिया के दौरान धीरे-धीरे सांस लें। 

(v)  यह प्रक्रिया कुछ मिनट तक करें जब तक कि आपको आराम महसूस ना हो। फिर अपनी सामान्य अवस्था में वापिस आ जायें। 

5. धनुरासन (Dhanurasana)- धनुरासन कमर दर्द से राहत पाने के लिये रामबाण योगासन माना जाता है। यह धनुरासन रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाकर, आकार सही करता है और शरीर में स्फूर्ति बनाये रखता है। इसमें योग करने वाला अपने शरीर को धनुष का आकार देता है।

धनुरासन करने का तरीका – How to do Dhanurasana

(i)  सबसे पहले मैट बिछाकर उल्टा यानी पेट के बल लेट जायें। ठोड़ी जमीन पर टिकायें, नजर सामने की ओर एकदम सीधी। दोनों हाथ जांघो से सटे हुए। 

(ii)  अब दोनों घुटनों को मोड़कर उठायें, दोनों हाथ पीछे ले जाकर टखनों को पकड़ लें। 

(iii) सांस लेते हुए अपनी छाती ऊपर उठायें, हाथों से पैरों को आगे की ओर खींचें और कसी हुई घुमावदार स्थिति में रहें धनुष के समान।

(iv) जितना हो सके, 10-20 सैकेन्ड इसी मुद्रा में रहें, फिर धीरे सांस छोड़ते हुए, धीरे से पैरों, ठोड़ी और छाती को जमीन पर टिकायें और आराम करें। फिर अपनी सामान्य मुद्रा में वापिस आ जायें। 

(v)  इस योगासन के पांच चक्र करें। 

6. वज्रासन (Vajrasana)- यह समस्त रूप से शक्ति प्रदान करने वाला योगासन है। इसकी यह विशेषता है कि आप इसे भोजन करने के बाद भी कर सकते हैं। इसके करने से रीढ़ की हड्डियां मजबूत होती हैं और कमर दर्द के साथ-साथ साइटिका के मरीजों को भी दर्द से मुक्ति मिलती है। साइटिका नसों में होने वाला ऐसा दर्द है जो कमर के निचले हिस्से से शुरू होता है पैरों के नीचे तक जाता है। वास्तव में यह रोग ना होकर सैक्रोलाइटिस, डिस्कप्रोलेप्स और स्पाइनल इंफेक्शन आदि  का लक्षण हो सकता है। वज्रासन के नियमित अभ्यास से नितंब के मसल्स, एरेक्टर स्पाइना (रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ की मांसपेशियां), क्वाड्रेट्स लुंबोरम (पेट की मांसपेशियां), एडेप्टर (हिप्स के जोड़ो की मांसपेशियां) आदि मजबूत होते हैं।  

वज्रासन करने का तरीका – How to do Vajrasana

(i)  जमीन पर मैट बिछाकर दोनों पैर सामने की ओर फैलाकर बैठ जायें। अब बायें पैर के घुटने को मोड़कर पीछे ले जाकर इस तरह बैठें कि पैर के पंजे पीछे और ऊपर की ओर रहे। इसी प्रकार अब दायें पैर के घुटने को मोड़कर पीछे ले जाकर इस तरह बैठें कि इसका भी पंजा पीछे और ऊपर की ओर रहे। इस प्रकार नितम्ब, दोनों एड़ियों के बीच में आ जायेंगे।

(ii)  दोनों पैर के अंगूठे एक दूसरे से इस तरह मिले होने चाहियें कि दोनों एड़ियों के बीच अंतर बना रहे। शरीर सीधा रखें एकदम तना हुआ और दोनों हाथों को घुटनों के ऊपर रख लें।

(iii) आंखें बंद कर लें, शरीर को ढीला छोड़ दें। धीरे-धीरे लंबी और गहरी सांस लें और धीरे-धीरे छोड़ें। 

(iv) इस मुद्रा में जितनी देर आराम से बैठ सकते हैं, बैठें। इसे आप 5 मिनट से 1 घंटा कर सकते हैं।

7. मत्स्य क्रीड़ासन (Fishing Game)- दोस्तो, मत्स्य क्रीड़ासन योगासन की दुनियां में सबसे सरल और आरामदायक योगासन है। इसे करने के लिये किसी विशेष स्थान पर जाने की आवश्यकता नहीं होती बल्कि आप लेटे-लेटे अपने बिस्तर पर भी कर सकते हैं। इसे करते समय आपका शरीर पानी में खेल रही मछली का आकार के समान हो जाता है। इसके करने से इम्म्यून सिस्टम तो मजबूत होता ही है, रीढ़ की हड्डियों का लचीलापन भी बढ़ता है और कमर दर्द से राहत मिलती है। 

मत्स्य क्रीड़ासन करने का तरीका – How to do Fishing Game

(i) यह आसन जहां भी आपको करना है, वहां शवासन में लेटकर बाईं ओर करवट ले लें दोनों हाथों से अपने सिर को सहारा दें यानी दोनों हाथ सिर के नीचे रखें।

(ii) अब दाएं पैर को आगे की ओर ऐसे रखें कि अंग्रेजी वर्णमाला कि ‘उल्टा L’ बना जाये। फिर दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में मिलाते हुए अपनी बाईं बाजू को सिरहाना मानते हुऐ उस पर अपना सिर रख लें। 

(iii) अब कोशिश करें कि आपके दाएं हाथ की कोहनी, दाएं पैर के घुटने को छू ले। दोनों हाथ की उंगलियां आपस में मिली रहेंगी। लंबी गहरी सांस लेते रहें। इस मुद्रा में 2-3 मिनट रहें। 

(iv) अब दाईं ओर करवट लेकर इस प्रक्रिया को दोहरायें। 

8. शवासन (Cremation)- यह ऐसा योगासन है जो किसी भी योगासन के अंत में किया जाता है। इसमें शरीर शव के समान रहता है। इसके करने से ना केवल शरीर में, बल्कि आतंरिक ऊर्जा भी बढ़ती है। यही प्राकृतिक ऊर्जा अनेक प्रकार की बीमारियों कमर दर्द सहित, का हरण कर लेती है। इसे नियमित रूप से करने पर तनाव और अनिद्रा को दूर किया जा सकता है और उच्च रक्तचाप सामान्य रहता है।  

शवासन करने का तरीका – How to do Cremation

(i) मैट बिछाकर पीठ के बल सीधे लेट जायें। दोनों पैरों के बीच लगभग डेढ़ फुट का अंतर बनाकर रखें। दोनों हाथों शरीर से 6 इंच की दूरी पर हों, बाजू शरीर से 45 डिग्री पर हों और हथेलियां आकाश की ओर खुली हुई रहनी चाहियें। 

(ii) आंखों को बंद कर लें, शरीर को ढीला छोड़ दें, सामान्य रूप से सांस लेते और छोड़ते रहें। मन को शांत करने की कोशिश करें। 

(iii) अब अपना ध्यान शरीर पर केंद्रित करें। पहले पंजों पर, फिर घुटने, पेट, छाती और फिर दोनों भौंहों के मध्य में ध्यान केंद्रित करें। धीरे-धीरे गहरी सांस लेते और छोड़ते रहें। 

(iv) इस अवस्था में शरीर को 5-7 मिनट स्थिर रखें।

(v) फिर अपने शरीर को धीरे-धीरे हिलायें, धीरे-धीरे आंखें खोलें और कुछ समय तक सुखासन या पद्मासन में बैठ कर विश्राम करें। 

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कुछ सावधानियां – Some Precautions

दोस्तो, यदि अपने दैनिक जीवन में कुछ निम्नलिखित सावधानियां बरती जायें तो स्लिप डिस्क की समस्या से बचा जा सकता  है –

1. सबसे पहले अपने वजन को कंट्रोल करें। अपना वजन सामान्य बनाये रखें।

2. वजन उठाते समय अपनी कमर का ध्यान रखें, सामान्य से अधिक वजन न उठायें। झुक कर झटके के साथ ज्यादा वजन ना उठायें। यह स्लिप डिस्क का कारण बन सकता है। 

3. अपने पॉस्चर का ध्यान रखें। बैठते, उठते, झुकते, लेटते हुऐ सही पॉस्चर रखें। 

4. अपने रोजगार संबंधी कार्य करते हुऐ, कम्प्यूटर पर काम करते हुऐ, मोबाइल का उपयोग करते हुऐ, इंडोर गेम खेलते हुऐ विशेष तौर पर पॉस्चर का ध्यान रखें।

5. बहुत ज्यादा देर लगातार ना बैठें। बीच-बीच में थोड़ा ब्रेक लेते रहें। चाहे, कमरे में ही टहलते रहें। 

6. नियमित रूप से एक्सरसाइज करें। इससे मांसपेशियां मजबूत रहेंगी।

7. नियमित रूप से योग, ध्यान और प्राणायाम करें। ये आपको स्लिप डिस्क की समस्या से दूर रखेंगे।

8. बैड का गद्दा अधिक सख्त या अधिक नर्म ना हो। 

9. बैड से लेटे हुऐ/सोते हुऐ से एकदम झटके के साथ ना उठें, पहले बैठ जायें फिर आराम से उठें। इसी प्रकार  कुर्सी से भी आराम से उठें ना कि एकदम झटके के साथ। 

10. कुर्सी पर कोई तकिया या कुशन रखें ताकि बैठते समय कमर में दर्द ना हो। और सीधे बैठें ना कि झुक कर।

11. सोते समय पीठ को सीधा करके सोयें। करवट लेने पर घुटनों के बीच तकिया लगायें। 

12. झटके के साथ गर्दन इधर उधर ना घुमायें।

13. लंबे समय तक लगातार ड्राईविंग ना करें।

14. वेस्टर्न कमोड का उपयोग करें। इससे झुकना नहीं पड़ता।

15. धूम्रपान ना करें। यह स्लिप डिस्क की समस्या का कारण बन सकता है। 

Conclusion – 

दोस्तो, आज के लेख में हमने आपको स्लिप डिस्क के लिए योगासन के बारे में विस्तार से जानकारी दी। रीढ़ की हड्डी क्या है, डिस्क क्या होती है, स्लिप डिस्क किसे कहते हैं, स्लिप डिस्क के कितने प्रकार होते हैं, स्लिप डिस्क के कारण क्या होते हैं, इसके लक्षण क्या होते हैं, इसके कितने चरण (Stages) होते हैं, इसका परीक्षण कैसे किया जाता है और इसकी चिकित्सा के क्या विकल्प हैं, इन सब के बारे में भी विस्तारपूर्वक बताया। देसी हैल्थ क्लब ने इस लेख के माध्यम से आपको स्लिप डिस्क से राहत पाने के लिये कुछ योगासन भी बताये और कुछ सावधानियां भी बताईं। आशा है आपको ये लेख अवश्य पसन्द आयेगा। 

दोस्तो, इस लेख से संबंधित यदि आपके मन में कोई शंका है, कोई प्रश्न है तो लेख के अंत में, Comment box में, comment करके अवश्य बताइये ताकि हम आपकी शंका का समाधान कर सकें और आपके प्रश्न का उत्तर दे सकें। और यह भी बताइये कि यह लेख आपको कैसा लगा। आप इस पोस्ट को अपने दोस्तों और  सगे – सम्बन्धियों के साथ भी शेयर कीजिये ताकि सभी इसका लाभ उठा सकें। दोस्तो, आप अपनी टिप्पणियां (Comments), सुझाव, राय कृपया अवश्य भेजिये ताकि हमारा मनोबल बढ़ सके। और हम आपके लिए ऐसे ही Health- Related Topic लाते रहें। धन्यवाद।

Disclaimer – यह लेख केवल जानकारी मात्र है। किसी भी प्रकार की हानि के लिये ब्लॉगर/लेखक उत्तरदायी नहीं है।  कृपया डॉक्टर/विशेषज्ञ से सलाह ले लें।

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स्लिप डिस्क के लिए योगासन -  Yoga For Slip Disc in Hindi
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स्लिप डिस्क के लिए योगासन - Yoga For Slip Disc in Hindi
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आज के लेख में हमने आपको स्लिप डिस्क के लिए योगासन के बारे में विस्तार से जानकारी दी। रीढ़ की हड्डी क्या है, डिस्क क्या होती है, स्लिप डिस्क किसे कहते हैं, स्लिप डिस्क के कितने प्रकार होते हैं, स्लिप डिस्क के कारण क्या होते हैं, इसके लक्षण क्या होते हैं, इसके कितने चरण (Stages) होते हैं।
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3 Comments

Rohit · August 1, 2021 at 4:36 pm

bahot hi achhi post likhi hai aapne slip disc ke liye…

  • Jiya Mittal · August 2, 2021 at 10:08 am

    This is a very interesting Article For Everyone about yoga for Slip Disc, I love this Article Thank you so much for sharing us.

  • Shiv Kumar Kardam · August 2, 2021 at 2:59 pm

    It’s unique.

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