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दोस्तो, स्वागत है आपका हमारे ब्लॉग पर। दोस्तो, आज हम एक ऐसे रोग की बात करेंगे जो किसी समय “खा जाने वाला रोग” के नाम से जाना जाता था। यद्यपि पूरे विश्व में इसे काफी हद तक कंट्रोल किया जा चुका है फिर भी आज के समय में इसकी मृत्यु दर अन्य बीमारियों की तुलना में सबसे अधिक है। यह रोग सीधे तौर पर फेफडों पर हमला करता है फिर शरीर के अन्य हिस्सों को भी अपनी चपेट में ले लेता है। इस रोग में मनुष्य की सारी ताकत लगभग खत्म हो जाती है। कभी इसे “लाइलाज बीमारी” कहा जाता था क्योंकि उस समय इसका समुचित इलाज नहीं था, इसी लिये इस रोग को “राजरोग” की संज्ञा दी गई। परन्तु आज के युग में इसका निश्चित रूप से इलाज है। हम बात कर रहे हैं टीबी की जिसे तपेदिक, यक्ष्मा और क्षय रोग कहा जाता है जिसे डॉक्टरी इलाज से तो ठीक किया ही जाता है, इसके लक्षणों के प्रभाव को भी घरेलू उपायों से खत्म किया जा सकता है। दोस्तो, यही है हमारा आज का टॉपिक “टीबी के घरेलू उपाय”

देसी हैल्थ क्लब इस आर्टिकल के माध्यम से आज आपको टीबी के बारे में विस्तार से जानकारी देगा और यह भी बतायेगा कि इसके घरेलू उपाय क्या हैं। इस रोग का इतिहास 17, 000 वर्ष पुराना है जिसके बारे में बताकर देसी हैल्थ क्लब अपने प्रिय पाठकों का समय बर्बाद नहीं करना चाहता। हम केवल इससे जुड़ी आवश्यक जानकारी देंगे। तो, सबसे पहले जानते हैं टीबी क्या होती है और यह कितने प्रकार की होती है। फिर इसके बाद बाकी बिन्दुओं पर जानकारी देंगे।

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टीबी के घरेलू उपाय
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टीबी क्या होती है? – What is TB?

दोस्तो, टीबी यानी ट्यूबरकुलोसिस (Tuberculosis) एक घातक बीमारी है जिसका इलाज यदि तुरंत ना किया जाये तो यह जानलेवा हो जाती है। टीबी को यक्ष्मा, तपेदिक और क्षय रोग के नाम से भी जाना जाता है। यह एक संक्रामक रोग है जो माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस (Mycobacterium Tuberculosis) नामक बैक्टीरिया के कारण होता है। टीबी के बैक्टीरिया, संक्रमित व्यक्ति की खांसी, छींक या उसकी लार द्वारा  हवा के माध्यम से फैलते हैं और स्वस्थ व्यक्ति को संक्रमित करते हैं।

टीबी के बैक्टीरिया आमतौर पर फेफड़ों पर हमला कर, फेफड़ों को प्रभावित करते हैं परन्तु यह शरीर के अन्य हिस्सों को भी प्रभावित करते हैं। इसका जिक्र हम बाद में करेंगे। टीबी विश्व में दूसरी सबसे बड़ी जानलेवा बीमारी है जिसकी मृत्यु दर सबसे अधिक है। डबल्यूएचओ के अनुसार प्रतिदिन, 4100 से अधिक लोगों की टीबी से जान चली जाती है। डॉ रॉबर्ट कोच ने 24 मार्च 1882 को टीबी का कारण बनने वाले जीवाणु की खोज की थी। अतः प्रति वर्ष 24 मार्च को, ट्यूबरकुलोसिस के हानिकारक प्रभाव, सामाजिक और आर्थिक परिणामों के बारे में जन मानस को जागरूक करने के लिये  टीबी दिवस मनाया जाता है। 

टीबी के प्रकार – Types of TB

टीबी मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है लेटेंट (Latent) और सक्रिय (Active)। इनका विवरण निम्न प्रकार है –

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1. लेटेंट टीबी (Latent TB) – लेटेंट टीबी का तात्पर्य है कि व्यक्ति के शरीर में टीबी का बैक्टीरिया तो है लेकिन प्रतिरक्षा प्रणाली बैक्टीरिया को सक्रिय नहीं होने देती। इसके लक्षण भी महसूस नहीं होते और ना ही यह व्यक्ति किसी दूसरे को संक्रमित कर सकता है परन्तु, किसी अन्य व्यक्ति जिसको एक्टिव टीबी है, उसके सम्पर्क में आने से लेटेंट टीबी वाला व्यक्ति एक्टिव टीबी का शिकार हो जायेगा। 

2. सक्रिय टीबी (Active TB) – प्रतिरक्षा प्रणाली टीबी के बैक्टीरिया को विकसित होने से नहीं रोक पाती तो बैक्टीरिया एक्टिव हो जाते हैं और मल्टीप्लाई होने लगते हैं। इसे सक्रिय टीबी कहा जाता है। इसके लक्षण भी प्रकट होते हैं और महसूस भी होते हैं। यह सबसे पहले फेफड़ों को प्रभावित करती है। सक्रिय टीबी से ग्रस्त व्यक्ति के बैक्टीरिया किसी भी स्वस्थ व्यक्ति को संक्रमित करने में सक्षम होते हैं। 

टीबी कहां-कहां हो सकती है? – Where can TB Occur?

दोस्तो, वैसे तो टीबी आमतौर पर फेफड़ों को प्रभावित करती है लेकिन शरीर के अन्य हिस्से भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के अनुसार टीबी रोग कहां-कहां होता है, इसका विवरण निम्न प्रकार है – 

1. पल्मोनरी (Pulmonary) – टीबी का यह रूप सबसे अधिक फेफड़ों को प्रभावित करता है। आमतौर पर इसमें खांसी होती है। और इसे टीबी का प्राथमिक रूप कहा जाता है। यह अक्सर बहुत ही कम उम्र वाले बच्चों या अधिक वृद्ध लोगों में होती है। इसके बैक्टीरिया शरीर के दूसरे अंगों में फैल सकते हैं।

2. एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (Extra Pulmonary TB)-  टीबी का यह रूप फेफड़ों के अतिरिक्त शरीर के अन्य हिस्सों को प्रभावित करता है जैसे हड्डियां, पेट, मुंह, गला, मस्तिष्क, किडनी और इम्यून सिस्टम ग्लैंड्स (Lymph nodes) आदि। एक्सट्रापल्मोनरी टीबी मुंह या गले में होने पर यह संक्रामक हो सकती है। एक्स्ट्रापल्मोनरी टीबी के कारण फोड़ा या घाव हो जाने पर भी यह संक्रामक हो सकती है।

3. मिलियरी टीबी (Miliary TB) – टीबी के बैक्टीरिया   ट्यूबरकल बेसिली (Tubercle bacilli) रक्त वाहिकाओं में चले जाते हैं तो फिर पूरे शरीर में फैल जाते हैं। ऐसे यह दुलर्भ और बेहद गंभीर मामले होते हैं। ऐसा सबसे ज्यादा  5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों और नवजात में होता है। चूंकि बैक्टीरिया पूरे शरीर में फैल चुका होता है अतः इस टीबी का पता शरीर के किसी भी अंग से लगाया जा सकता है। 

4. केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System) – मस्तिष्क या रीढ़ की हड्डी में टीबी होने के बजाय इनके आसपास के ऊतकों में होती है। इस स्थिति को ट्यूबरकोलोसिस मेनिन्जाइटिस (Tuberculous meningitis) के नाम से जाना जाता है। 

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टीबी होने के कारण – Cause of TB

टीबी होने के निम्नलिखि कारण हो सकते हैं – 

1. माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस (Mycobacterium tuberculosis) नामक बैक्टीरिया  टीबी का मुख्य है।

2. कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले छोटे बच्चे और बुजुर्ग।

3. टीबी ग्रस्त किसी व्यक्ति के साथ लंबे समय तक सम्पर्क में रहना।

4. टीबी ग्रसित व्यक्ति की वस्तुओं और कपड़े जैसे  रुमाल या तौलिया का उपयोग करने से। 

5. एचआईवी पोजिटिव की स्थिति में, मीजल्स, न्यूमोनिया की स्थिति में भी टीबी होने की संभावना रहती है। 

6. साफ-सफाई के प्रति उदासीनता। 

7. स्मोकिंग करना।

8. अल्कोहल या अन्य ड्रग्स का सेवन करना।

9. कपड़ा मिल में या धागा फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों को टीबी होने की ज्यादा संभवाना रहती है।

10. सीमेंट फैक्ट्री और कोयला खादान में काम करने वाले मजदूरों को भी टीबी होने की ज्यादा संभवाना रहती है।

11. शरीर में पोषण की कमी।

12. लंबे समय तक जंक फूड खाना।  

13. गाय का कच्चा दूध पीने से टीबी हो सकती है। 

14. टीबी ग्रस्त व्यक्ति का खून गलती से किसी और व्यक्ति को चढ़ा दिया जाये।

टीबी के लक्षण – Symptoms of TB

आमतौर पर टीबी के निम्नलिखित लक्षण होते  हैं –

1. लंबे समय तक खांसी रहना।

2. खांसी में बलगम और बलगम में खून का आना।

3. बेहद कमजोरी और थकावट।

4. खांसी के साथ उल्टी आना।

5. सांस लेते समय छाती में दर्द होना।

6. शाम को बुखार का आना।

7. रात में पसीना आना।

8. भूख कम हो जाना।

9. वजन कम होना और शरीर में दर्द रहना।

10. पीठ में अकड़न

11. मांसपेशियों की क्षति

12. ग्रंथियों में स्थिर सूजन

13. पेट में दर्द

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14. स्थिर सिरदर्द

15. प्रभावित हड्डी में दर्द और उसकी कार्य क्षमता में कमी होना।

टीबी से होने वाली जटिलताएं – Complications from TB

टीबी से होने वाली कुछ जटिलताऐं निम्न प्रकार   हैं –

1. रीढ़ की हड्डी में दर्द – रीढ़ की हड्डी में दर्द होने की वजह से पूरी पीठ में दर्द होता है और अकड़न बनी रहती है।

2.  जोड़ों में दर्द – टीबी कूल्हों और घुटनों को प्रभावित करती है। इनमें दर्द रहने लगता है।

3. मेनिंजाइटिस (Meningitis) – मस्तिष्क को ढकने वाली झिल्ली में सूजन आ जाती है। इसे दिमागी बुखार कहा जाता है। इसकी वजह से स्थायी रूप से या रूक-रुक कर सिर दर्द होता है जो कई हफ्तों तक चलता है। 

4. लिवर और किडनी संबंधी समस्याएं (Liver and Kidney Problems)- टीबी लिवर और किडनी दोनों को ही प्रभावित कर सकती है जिसकी वजह से इनकी कार्य प्रणाली कमजोर पड़ सकती है।

5. हृदय संबंधी समस्याएं (Heart Problems)- दुर्लभ मामलों में टीबी से हृदय संबंधी समस्याऐं उत्पन्न हो जाती हैं क्योंकि यह हृदय के आस-पास के ऊतकों को प्रभावित करती है।  जिससे ऊतकों में सूजन आ जाती है और तरल पदार्थ जमा होने लगता है। इसे कार्डियक टैंपोनेड कहते हैं। इसमें हृदय की पंप करने की क्षमता प्रभावित होती है।

टीबी का परीक्षण – TB test 

टीबी की जांच त्वचा पर, एक्स-रे, लार का टेस्ट और ब्लड टेस्ट के जरिये किया जाता है। विवरण निम्न प्रकार है –

1. त्वचा वाला टेस्ट (Skin Test)- त्वचा पर प्यूरीफाइड प्रोटीन डेरीवेटिव (Purified Protein Derivative) इन्जेक्शन लगाकर टेस्ट किया जाता है। इन्जेक्शन लगने के 2, 3 दिन बाद देखते हैं कि यदि कोई निशान त्वचा पर बन जाता है तो इसका अर्थ होता है कि व्यक्ति टीबी वायरस की चपेट में है। परन्तु इससे यह पता नहीं चलता कि यह सक्रिय संक्रमण है या नहीं।  

2. छाती का एक्स-रे (Chest X-ray)- पीपीडी टेस्ट पोजिटिव आने पर छाती का एक्स-रे किया जाता है। यदि इसमें फेफड़ों में छोटे धब्बे दिखाई देते हैं तो यह टीबी होने का संकेत होता है। यदि एक्स-रे निगेटिव आता है तो इसका अर्थ है कि या तो पीपीडी टेस्ट गलत था या लेटेंट टीबी है।

3. लार का टेस्ट (Saliva Test)- इसमें थूक या बलगम का सैंपल लेकर लैब में माइक्रोस्कोप से जांच की जाती है। यदि यह टेस्ट पोजिटिव आता है तो इसका मतलब है कि व्यक्ति को टीबी है और वह दूसरों को भी संक्रमित कर सकता है। 

4. ब्लड टेस्ट (Blood Test)- ब्लड टेस्ट से यह कंफ़र्म हो जाता है व्यक्ति को लेटेंट टीबी है या सक्रिय (Active) है। 

टीबी का उपचार – TB Treatment

1. एंटीबोयोटिक दवाओं के जरिये बैक्टीरिया को मारकर टीबी का इलाज किया जाता है। ये दवाऐं हर मरीज को दी जाती हैं, चाहे वह शिशु हो, बच्चा, गर्भवती महिला हो या कमजोर इम्युनिटी वाले लोग।  कुछ सामान्य इस प्रकार  हैं –

(i)  आइसोनियाजिड (Isoniazid – INH)

(ii) रिफैम्पिन (Rifampin – RIF)

(iii) इथाम्बुटोल (Ethambutol – EMB)

(iv) पाइराजिनमाइड (Pyrazinamide – PZA)

2. सक्रिय (Active) टीबी का उपचार –

(i)  मल्टीड्रग-रेसिसटेंट टीबी की रोकथाम हेतु दो महीने के लिये चार प्रकार की दवाओं का उपयोग करना। जरूरत के अनुसार इस उपचार को चार से नौ महीने या और अधिक समय तक बढ़ाया जा सकता है। 

(ii)  जब उपचार के दौरान या बाद में टेस्ट से पता चले कि टीबी बैक्टीरिया अभी भी सक्रिय है तो अलग प्रकार की दवाओं के संयोजन (Combination) का उपयोग करना। इस स्थिति को ड्रग प्रतिरोधी स्थिति कहा जाता है।

(iii) एचआईवी से पीड़ित लोगों के लिये, ड्रग प्रतिरोधी स्थिति वाले लोग, गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिये अलग उपचार की प्लानिंग और व्वस्था करना। 

3. लेटेंट (Latent) टीबी के इलाज के लिए

(i) मरीज को सक्रिय (Active) टीबी से बचाने के लिये और टीबी के बैक्टीरिया को मारने के लिये एक ही दवा आइसोनियाजिड (Isoniazid) का उपयोग करना। यह 9 महीने के लिये दी जाती है। जो इस दवा को इतने लंबे समय के लिये नहीं ले सकते उनके लिये अलग से प्लानिंग की जाती है। 

(ii) रिफैम्पिन का 4 महीने के लिये उपयोग, वैकल्पिक उपचार है। यह विशेषकर उन लोगों के लिये है जो टीबी के उन बैक्टीरिया की चपेट में आते हैं जिनसे आइसोनाइजिड प्रतिरोधी स्थिति बनती है। 

(iii) बैक्टीरिया को खत्म के लिये 12 हफ्ते तक 2 एंटीबायोटिक्स दवाऐं लेना जोकि डॉक्टर या स्वास्थ्य पेशेवर के निरीक्षण में दी जाती हैं। इनमें आइसोनाइजिड और रिफैपेन्टाइन या आइसोनाइजिड और रिफैम्पिन शामिल  होती हैं। 

टीबी के घरेलू उपाय – Home Remedies for TB

दोस्तो, सबसे पहले देसी हैल्थ क्लब यह स्पष्ट करता है कि टीबी का डॉक्टरी इलाज ही होता है। घरेलू उपाय इसके प्रभाव को कम करने मदद करते हैं। अब बताते हैं आपको कुछ निम्नलिखित उपाय जिनको अपनाकर टीबी के प्रभाव को कम करके जल्दी ही इससे मुक्ति पाई जा सकती है – 

1. टीबी का उपाय है आँवला (Amla)- आँवला विटामिन-सी का भरपूर स्रोत होता है जोकि शरीर में शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट का काम करता है। एंटीऑक्सीडेंट के अतिरिक्त आँवला में एंटीइंफ्लामेटरी और एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं जो सूजन को कम करते हैं और बैक्टीरिया को खत्म करते हैं। आँवला के पोषक तत्व  प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने के साथ-साथ शरीर को ऊर्जा देता है जिससे शरीर के अंगों की कार्य क्षमता में सुधार आता है। टीबी के मामले में रोजाना सुबह खाली पेट, 3-4 आँवला काट कर बीज अलग करके इसके गूदे का जूस निकाल कर, थोड़ा पानी डालकर इसमें एक चम्मच शहद अच्छी तरह मिलाकर, पीयें। 

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2. संतरे का जूस (Orange Juice)- संतरा भी विटामिन-सी से भरपूर होता है। इसके एंटीऑक्सीडेंट गुण प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ाते हैं और एंटीबैक्टीरियल गुण बैक्टीरिया को मारने का काम करते हैं। संतरे का जूस के जरिये फेफड़ों में सलाइन पहुंचता है जो कफ को कम करने का काम करता है। रोजाना सुबह और शाम एक-एक गिलास संतरे के ताजा जूस में जरा सा नमक और एक चम्मच शहद मिलाकर पीयें। 

3. सीताफल (Cilantro)- सीताफल को शरीफा भी कहा जाता है जोकि एक बेहतरीन एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण वाला फल है और इसमें कई तरह के एंटी-ऑक्सीडेंट होते हैं। टीबी के उपचार के लिये इसके गूदे का उपयोग किया जाता है। एक गिलास पानी में दो सीताफल के गूदे और 25 किशमिश, बिना बीज वाली डालकर तब तक उबालें जब तक कि पानी एक तिहाई ना रह जाये। इसे छानकर इसमें आधी छोटी चम्मच इलायची पाउडर, जरा सी दालचीनी पाउडर डालकर, ठंडा करके पीयें। चाहें तो इसमें एक चम्मच चीनी डाल सकते हैं। सारे दिन में इसे दो बार पीयें। 

4. केला (Banana)- केला फाइबर और कैल्शियम का अच्छा स्रोत है। इनके अतिरिक्त कई अन्य खनिज और विटामिन होते हैं जो टीबी से ग्रस्त व्यक्ति की प्रणाली को बढ़ाने का काम करते हैं। केला बलगम और बुखार को भी कम करता है। टीबी के मामले में एक कप नारियल पानी में एक केला मैश करके डाल दें, इसमें आधा कप दही और एक चम्मच शहद भी मिलाऐं। इसे सारे दिन में दो बार पीयें। इसके अतिरिक्त केले के डंठल का जूस निकाल कर पीयें। इससे पुराना और अधिक मात्रा वाला बलगम, रात में बुखार आना और अधिक पसीना आना जैसे लक्षणों का प्रभाव कम हो जायेगा। या दिन में एक बार कच्चे केले का जूस निकाल कर पीयें।

5. काली मिर्च (Black Pepper)- फेफड़ों की सफाई के लिये काली मिर्च एक प्राकृतिक उपाय है। टीबी के मामले में काली मिर्च एक बेहतरीन उपाय है। इसके एंटीइंफ्लामेटरी गुण फेफड़ों की सूजन कम करते हैं और एंटीबैक्टीरियल गुण उन बैक्टीरिया के विरुद्ध लड़ते हैं जो टीबी और निरन्तर कफ का कारण होते हैं। काली मिर्च के 10-12 दाने लेकर देशी घी में फ्राई कर लें। इसमें चुटकी भर हींग पाउडर मिलाकर इस मिश्रण के तीन बराबर हिस्से कर लें यानी ये तीन खुराक बन जाती हैं। इनको कुछ घंटों के अंतराल पर चबाकर खायें। 

6. लहसुन (Garlic)- लहसुन में मौजूद सल्फरिक एसिड उन बैक्टीरिया को खत्म करने का कार्य करता है जो टीबी रोग का कारण बनते हैं। लहसुन में पाये जाने वाले  एलिसिन (allicin) और अजोएन (ajoene) बैक्टीरिया के विकास को रोकते हैं और इसके एंटीबैक्टीरियल गुण प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करते हैं। टीबी के लक्षणों के प्रभाव को कम करने के लिये लहसुन को कच्चा पक्का जैसे मर्जी खाइये, हर तरीके से यह फायदा पहुंचायेगा। 

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लहसुन की 8-10 कलियों को एक कप दूध में उबाल कर खायें और दूध पीयें। ध्यान रहे इसके बाद पानी नहीं पीना। या आधा चम्म्च पिसा/कुटा हुआ लहसुन एक कप दूध में डाल दें, फिर इसे चार कप पानी में डाल कर तब तक उबालें जब तक यह एक चौथाई ना रह जाये। या रात को सोने से पहले लहसुन का रस निकाल कर 8-10 बूंदें एक गिलास गर्म दूध में डालकर पीयें। 

7. सहजन की पत्तियां( Drumstick Leaves) – सहजन की फलियों और पत्तियों में केरोटीन, कैल्शियम, फॉस्फोरस और विटामिन-सी मौजूद होते हैं। सहजन की पत्तियों के एंटीबैक्टीरियल गुण फेफड़ों से उन बैक्टीरिया को खत्म करते हैं जो टीबी का कारण बनते हैं। इसके एंटीइंफ्लामेटरी गुण फेफड़ों की सूजन कम करते हैं। टीबी के उपचार के लिये रोजाना सुबह के समय एक मुट्ठी सहजन की पत्तियों को एक कप पानी में डालकर कुछ मिनट तक उबालें। इसे ठंडा करके, जरा सा नमक,मिर्च और नींबू का रस मिला कर, खाली पेट पीयें। 

8. पुदीना (Mint)- पुदीना के एंटीबैक्टीरियल गुण टीबी उत्पन्न करने वाले बैक्टीरिया को खत्म करने में मदद करते हैं। यह फेफड़ों के बलगम को ढीला कर बाहर निकालता है और फेफड़ों को स्वस्थ बनाता है। यह टीबी की दवाओं के रिएक्शन को भी खत्म करता है। टीबी के उपचार के लिये एक चम्मच पुदीना का रस, दो चम्मच शहद, दो चम्मच सिरका और आधा कप गाजर का जूस मिलाकर रख लें। इस मिश्रण को कुछ कुछ घंटों के अंतराल पर तीन बार में पीयें। 

9. अखरोट (Walnut)- अखरोट बहुत शक्तिशाली ड्राई फ्रूट है जो शरीर में एनर्जी भर देता है। टीबी के मरीज के लिये तो बेहद लाभकारी है, यह मरीज की प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ाकर उसके शरीर में ताकत बनाये रखता है। इसके लिये रोजाना दो चम्मच पिसे हुऐ अखरोट के पाउडर में एक चम्मच लहसुन का पेस्ट और एक चम्मच देशी घी मिलाकर खायें। 

10. ग्रीन टी (Green Tea)- नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन की वेबसाइट पर प्रकाशित रिपोर्ट बताती है कि ग्रीन टी और अन्य चाय की पत्तियों में एपिग्लोकैटेचिन-3-गैलेट (ईजीसीजी) नामक पॉलीफेनोल्स मौजूद होते हैं जो टीबी के बैक्टीरिया के विकास रोकने में मदद करते हैं। टीबी के प्रभाव को कम करने के लिये दिन में दो बार ग्रीन टी में आधा चम्मच शहद पीयें। 

टीबी के मरीज को क्या खाना चाहिए? – What Should a TB Patient Eat?

1. टीबी के मरीज को हमेशा हल्का और पौष्टिक भोजन करना चाहिये जो आसानी से पच भी जाये।

2.  टीबी के मरीज को हरी पत्तेदार सब्जियां और फलियां खानी चाहियें जिनसे आयरन और विटामिन-बी मिलते रहें। 

3. फलों में सीताफल (शरीफा) और बेरी खाने चाहियें ताकि इनसे विटामिन, पोटेशियम और अन्य खनिज मिलते रहें। 

4. हरी सब्जियां खायें।  करेला, खीरा, मटर, पालक, घि‍या, टमाटर, आलू, फूल गोभी और लहसुन को भोजन में शामि‍ल करें। 

5. चावल, दालें, सूजी, बाली, जौ आदि का उपयोग करें। 

6. मछली, ड्राई फ्रूट्स, अलसी आदि का सेवन करें ताकि  ओमेगा-3 फैटी एसिड मिलता रहे।

7. प्रोटीन के पूर्ति के लिये मछली, तोफू, पनीर, दालें, अंडे, सोया और मांस का सेवन करें। 

8. केवल टोंड दूध ही पीयें। 

टीबी में क्या नहीं खाना चाहिए? – What Should not be Eaten in TB?

टीबी के मरीज को निम्नलिखित पदार्थों से परहेज करना चाहिये –

1. तंबाकू का उपयोग किसी भी रूप में ना करें।

2. शराब व अन्य एल्कोहोल और ड्रग्स आदि का उपयोग ना करें। 

3. फास्ट फूड से दूरी बनाकर रखें। 

4. पेट में गैस बनाने वाले या देर से पचने वाले खाद्य/पेय पदार्थों का उपयोग ना करें। 

5. उच्च वसा और उच्च कोलेस्ट्रॉल वाले खाद्य पदार्थों का उपयोग ना करें।  

टीबी से बचाव के कुछ टिप्स – Some Tips to Prevent TB

अब बताते हैं आपको कुछ निम्नलिखित टिप्स जिनके जरिये टीबी के संक्रमण को रोका जा सकता है – 

1. सबसे पहले तो बच्चों को बैसिलस केलमेटे-ग्यूरिन (Bacillus Calmette-Guerin, BCG) का टीका लगवायें।

2. टीबी से ग्रस्त व्यक्ति के साथ कमरे में जाने से पहले मुंह पर मास्क लगायें और कमरे में अधिक समय ना बितायें। वापस आकर मास्क को सेनिटाइज करके डस्टबिन में डाल दें। 

3. टीबी से ग्रस्त व्यक्ति को बाहर भीड़ भाड़ वाली जगह पर जाना अवॉइड करना चाहिये। 

4. टीबी से ग्रस्त व्यक्ति का कमरा वेंटीलेशन वाला होना चाहिये।

5. टीबी से ग्रस्त व्यक्ति को रेस्पिरेटर (Respirator), एक प्रकार का मास्क, का उपयोग करना चाहिये।

6. टीबी से ग्रस्त व्यक्ति को उपचार के 3-4 हफ़्तों तक किसी भी व्यक्ति से संपर्क नहीं करना चाहिये।

7. खांसते, छींकते समय मुंह को टिश्यू से कवर करें, फिर टिश्यू को किसी प्लास्टिक के बैग में सील करके डस्टबिन में डाल दें।

8. कार्य स्थल, स्कूल या सार्वजनिक स्थानों पर जाना अवॉइड करें। अपने घर पर ही रहें। 

9. पब्लिक ट्रांस्पोर्ट को अवॉइड करें।

10. धूम्रपान ना करें।

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11. अल्कोहल का इस्तेमाल ना करें।

12. भोजन करने से पहले और बाद में हाथ धोयें। 

13. खांसने और छींकने के बाद में हाथ धोयें। 

14. डॉक्टर के दिशा निर्देशों का पालन करें। अपनी मर्जी से दवाऐं बंद ना करें। 

Conclusion – 

दोस्तो, आज के आर्टिकल में हमने आपको टीबी के घरेलू उपाय के बारे में विस्तार से जानकारी दी। टीबी क्या होती है?, टीबी के प्रकार, टीबी कहां-कहां हो सकती है, टीबी होने के कारण, टीबी के लक्षण, टीबी से होने वाली जटिलताऐं, टीबी का परीक्षण, टीबी का उपचार, टीबी के मरीज को क्या खाना चाहिये और टीबी में क्या नहीं खाना चाहिये, इन सब के बारे में भी विस्तारपूर्वक बताया। देसी हैल्थ क्लब ने इस आर्टिकल के माध्यम से टीबी के घरेलू उपाय बताये और टीबी से बचाव के कुछ टिप्स भी दिये। आशा है  आपको ये आर्टिकल अवश्य पसन्द आयेगा। 

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Disclaimer – यह आर्टिकल केवल जानकारी मात्र है। किसी भी प्रकार की हानि के लिये ब्लॉगर/लेखक उत्तरदायी नहीं है। कृपया डॉक्टर/विशेषज्ञ से सलाह ले लें।

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टीबी के घरेलू उपाय
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दोस्तो, आज के आर्टिकल में हमने आपको टीबी के घरेलू उपाय के बारे में विस्तार से जानकारी दी। टीबी क्या होती है?, टीबी के प्रकार, टीबी कहां-कहां हो सकती है, टीबी होने के कारण, टीबी के लक्षण, टीबी से होने वाली जटिलताऐं, टीबी का परीक्षण, टीबी का उपचार, टीबी के मरीज को क्या खाना चाहिये और टीबी में क्या नहीं खाना चाहिये, इन सब के बारे में भी विस्तारपूर्वक बताया।
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